Thursday, 26 April 2018

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 अभियोगी रविन्‍द्र को उपहति कारित करने का सामान्‍य आशय निर्मित किया जिसके अग्रशरण में अभियोगी को डंडे से मारपीट कर उपहति कारित की, आपस में मिलकर अभियोगी को घातक हथियार से उपहति कारित करने का सामान्‍य आशय निर्मित किया जिसके अग्रसरण में अभियोगी को घातक आयुध चाकु से मारकर उपहति कारित की। तथा अभियोगी को माता बहन की अश्‍लील गालियां सार्वजनिक स्‍थल या उसके समीप देकर अभियोगी को तथा सुनने वालों को क्षोभ कारित किया। प्रकरण में अभियुक्‍तण की गिरफ्तारी निर्विवादित है। अभियोगी तथा अभियुक्‍तगण का पर्वू से परिचित होना भी निर्ववादित है। अभियोजन की कहानी संक्षेप में इस प्रकार है कि घटना दिनांक 21 अप्रैल 2008 को अभियोगी और अभियुक्‍तण आए और अभियोगी को देखकर उसके साथ गाली देने लगे फिर अभियोगी ने कहा कि गाली क्‍यों देते हो तभी अभियुक्‍त हाथ में डंडा लेकर आया और अभियोगी को मारा फिर अभियोगी ने डंडा छीन लिया, उसी समय अभियुक्‍त ने पीछे से आकर अभियोगी की पीठ में व कमर में जाकू से मारा, जिससे उसके सिर से खून निकला फिर अभियोजन साक्षी ने छुड़ाया फिर अभियोगी का भाई अभियोगी को इलाज हेतु कार से सरकारी अस्‍पताल उज्‍जैन ले गया जहां अभियोगी का इलाज हुआ। उक्‍त्‍ घटना की सूचना जिला चिकित्‍सालय उज्‍जैन से थाना उज्‍जैन केा दी गई जिसे थाना उज्‍जैन में 283/31पर पंजीबद्ध किया गया तथा घटना का क्षेत्राधिकार गौतमपुरा होने से थाना उज्‍जैन भेजा गया तथा उक्‍त संदेह के आधार पर थाना गौतमपुरा का अपराध क्रमांक 90/2008 पंजीबद्ध किया गया। विवेचना के दौरान घटना स्‍थल का मौका नक्‍शा बनाया गया, आहत का चिकित्‍सीय परीक्षण कराकर चिकित्‍सीय दस्‍तावेज प्राप्‍त किए गए, साक्षीगण के कथन लेखबद्ध किए गए। अभियुक्‍त को पकड़कर पंचनामा बनाया गया, जप्‍ती अनुसार जप्‍ती पंचनामे बनाए गए। तद्परान्‍त अभियोग पत्र न्‍यायालय में पेश किया गया।
       उक्‍त मामले में अभियोगी को अश्‍लील गालिया देकर उसे एवं सुनने वालों को  क्षोभ कारित किया एवं अभियोगी को  घटना कारित करने के आशय से  अभियोगी को  जान से मारने की धमकी  देकर आपराधिक अभित्रास कारित किया। यह भी प्रमाणित नहीं हुआ है कि अभियुक्‍तगण ने प्रतिबंधित आकार-प्रकार का हथियार अपने आधिपत्‍य में रखा। फलस्‍वरूप अभ्यिुक्‍तगण को  धारा 294 एवं  506 भाग-2 भारतीय दण्‍ड संहिता तथा धारा 25 की उपधारा 2 आयुध अधिनियम के आरोप से दोषमुक्‍त कर प्रकरण से स्‍वतंत्र किया जाता है। अभियोजन द्वारा युक्तियुक्‍त संदेह के परे प्रमाणित किया गया है कि घटना दिनांक समय एवं स्‍थान पर अभियुक्‍तगण ने अभियोगी को उपहति कारित करने के सामान्‍य आशय के अग्ररण में उपहतियां कारित की जिनमें अभियुक्‍त ने धारदार हथियार से मारपीट कर स्‍वेच्‍छा उपह‍ति कारित की।

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उभय पक्ष द्वारा एक राजीनामा आवेदन पत्र अंतर्गत धारा 320 दण्‍ड प्रक्रिया संहिता प्रस्‍तुत किया गया। अपने आवेदन पत्र में उभयपक्ष द्वारानिवेदन किया गया है कि उनका न्‍यायालय के बाहर के राजीनाम हो गया है तथा वे प्रकरण में अब कोई कार्यवाही नहीं चाहते। फरियादी के राजीनामा कथन अंकित किए गए। प्रकरण का अवलोकन किया गया। प्रकरण के अवलोकन से विदित होता है कि प्रकरण में आरोपी के विरूद्ध भारतीय दण्‍ड विधान की धारा 341, 306 के अंतर्गत आरोप है जिसमें से भारतीय दण्‍डड विधान की धारा 341 में से स्‍वंत: राजीनामा करने में सक्षम हो। अत: उक्‍त राजीनामा विधि सम्‍मत एवं स्‍वेचछापूर्वक किया जाना प्रकट हो  रहा है। उभय पक्ष के मध्‍य आपस में मधुर संबंध स्‍थापित हो गए है। और भविष्‍य में भी उनके मध्‍य मधुर संबंध बने रहे इसे दृष्टिगत रखते हुए समाजवादी पक्षों को राजीनामा करने की अनुमति प्रदान की जाती है।
       राजीनामा स्‍वीकार किया जाता है। राजीनामा स्‍वीकार किए जाने के फलस्‍वरूप आरोपी को भारतीय दण्‍ड विधान की धारा 341 के आरोप से दोषमुक्‍त किया जाता है। शेष भारतीय दण्‍ड विधान की धारा 324 शमनीय ना होने  से उक्‍त धारा के अंतर्गत आरोपी के विरूद्ध विचारण जारी रखा जाता है। फरियादी को बाद में परीक्षण से  उक्‍त धारा के अंतर्गत आरोपी के विरूद्ध विचारण जारी रखा जाता है। फरियादी को वाद में परीक्षण, प्रतिपरीक्षण से उन्‍मुक्‍त किया गया।
       लोक अभियोजक द्वारा निवेदन किया गया कि प्रकरण के सभी महत्‍वपूर्ण साक्षियों के कथन हो चुके है तथा प्रकरण से यह प्रतीत होता है और अवलोकन उपरांत वाद विचार लोक अभियोजक को पेश किया जाता है। प्रकरण में आई साक्ष्‍य की प्रकृति  को देखते हुए आरोपीगण का धारा 313 दण्‍ड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत परीक्षण किया जाना आवश्‍यक नहीं है। प्रकरण में आज ही अंतिम तर्क लिखित किए गए।
       प्रकरण में निर्णय प्रथक से लिखित करवाया जाकर खुले न्‍यायालय में उद्धोषित कर हस्‍ताक्षरित एवं दिनांकित किया गया। निर्णय अनुसार आरोपी को भारतीय दण्‍ड विधान की धारा 324 के  आरोप से  दोषमुक्‍त किया गया। आरोपी के जमानत मुचलके भारमुक्‍त किए जाती है। आरोपी अनुसंधान एवं विचारण के दौरान न्‍यायिक अभिरक्षा संबंधी धारा 428 दण्‍ड प्रक्रिया संहिता का प्रमाण पत्र बनाया जावे। प्रकरण का परिणाम आपराधिक पंजी में दर्ज कर प्रकरण  को व्‍यवस्थित समयावधि में जमा किया जावे।
       परिवादी द्वारा प्रस्‍तुत किए गए परिवाद पत्र दस्‍तावेज एवं परिवादी के कथनों से उनके अवलोकन के आधार पर आरोपी के विरूद्ध प्रथम द्ष्‍टया धारा138 के अपराध के लिए पर्यापत आधार प्रकट होते है। अत: धारा 190 दण्‍ड प्रक्रिया संहिता के तहत उक्‍त अपराध में संज्ञान लिया जाता है। और आरोपी के विरूद्ध परिवाद पत्र धारा 138 के अपराध में पंजीबद्ध करने का आदेश दिया जाता है।

Wednesday, 25 April 2018

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इस संबंध में कोई विवाद नहीं है कि प्रत्‍यर्थी उक्‍त अवधि के दौरान अस्‍वस्‍थ था य‍द्धपि जारी किए गए प्रमाण पत्र की तारीख में कुछ त्रुटिया हो सकती है तथापि अपीलार्थी द्वारा इस बात का खण्‍डन नहीं किया गया है कि प्रत्‍यर्थी अवसादक मनोविकृति और किसी गंभीर रोग से पीडि़त था। इस संबंध में ही विवाद नहीं किया गया है कि प्रत्‍यर्थी को उसकी नियुक्ति की तारीख से अब तक अपीलार्थी बोर्ड से सेवा के दौरान इससे पूर्व कोई दण्‍ड नहीं दिया गया था। अत: इन परिस्थितियों में अपराधीकृत अनुपस्थिति के आरोप के लिए सेवा से हटाने का दण्‍ड अधिरोपित करना अत्‍यंत कठोर और दण्‍डनीय होगा। उक्‍त मामले में ऐसे दण्‍ड निरंतर अवचार के संचयी प्रभाव के रूप में या ऐसे अन्‍य कारणो से दिया जाता है, जहां आरोप अत्‍यंत गंभीर होते है और जहां यदि भ्रष्‍टचार का आरोप साबित हो जाता है मामले में प्रत्‍यर्थी के विरोध ऐसे कोई अभिकथन नहीं है। इसके अलावा विद्यवान एकल न्‍यायाधीश ने पदुच्‍यति के आदेश को अपास्‍थ करते समय प्रत्‍यर्थी को पिछली मजदूरी देने से इंकार करके सही किया है। क्‍योंकि प्रत्‍यर्थी सुसंगत अवधि के दौरान कर्तव्‍य का निर्वहन करने में असफल रहा है।
       यह उल्‍लेखनीय है कि विलंब न्‍यायालय के मार्ग में अड़चन है। कतिपय परिस्थितियों में विलंब और उल्‍लेख घातक नहीं हो सकता है। किंतु अधिकांश परिस्थितियों में असाधरण विलंब से उस मुकदमेंवाज के लिए जो उस न्‍यायालय में समावेदन करता है घोर संकट पैदा होगा। विलंब से मुकदमेंवाजी की ओर निष्क्रियता और अकर्मण्‍रूता प्रतिबंधित होती है। ऐसा मुकदमेंवाद जो आधारभूत मानको को भूल गया अर्थात तालमटोल करने वाला समय का सबसे बड़ा लुटेरा है। विधि किसी व्‍यक्ति को अमर पक्षी की तरह सोने और जागने की अनुज्ञा नहीं देती। विलंब से खतरा पैदा होता है और मुकदमेवाजी को क्षति कारित होती है। वर्तमान मामले में यद्धपि न्‍यायालय को समावेदन करने में चार वर्ष का विलंब हुआ है तथापि रिट न्‍यायालय ने इस ओर ध्‍यान नहीं दिया। न्‍यायालय का यह कर्तव्‍य है कि वह इस बात की समवीक्षा करे कि क्‍या इतने बड़े विलंब की किसी न्‍यायोचित के बिना अनदेखी की जानी चाहिए। इसके अलावा प्रस्‍तुत मामले में ऐसी विलंबित परिस्थिति और अधिक महत्‍वपूर्ण हो जाती है।
       यह निगरानी इस आधार पर प्रस्‍तुत की गई है कि विद्यवान विचारण न्‍यायालय का आदेश कानूनन व विधिविरूद्ध व त्रुटिपूर्ण है विचारण न्‍यायालय ने इस महत्‍वपूर्ण तथ्‍य पर विचार नहीं किया कि आवेदिका, आनावेदक की वैध पत्नि है, जिसके भरण-पोषण का विधिक व नैतिक उत्‍रदायित्‍व अनावेदक का ही है। विचारण न्‍यायालय ने बात पर भी विचार नहीं किया।

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प्रकरण में यह भी निर्ववादित है कि सड़क निर्माण हेतु चार लाख रूपए स्‍वीकृत हुए थे जिनकी स्‍वीकृत सरपंच के ही अधीन थी कार्य के प्रारंभ में उपयंत्री ही लेआऊट बनाता है और मार्गदर्शन देता है। इसकेपश्‍चात कार्य पूर्णत प्रमाणपत्र पर कार्य हो जाने के उपरांत सचिव एमआईएस के आधार पर केश बुक पर जानकारी भरता है। हस्‍ताक्षर करता है, पश्‍चात सरपंच कार्यपूर्णत: प्रमाण पत्र पर हस्‍ताक्षर करता है और उसे उपयंत्री के पास भेजा जाता है। उपयंत्री भौतिक सत्‍यापन करते हुए प्राकलन करके कार्यपूर्णता प्रमाणपत्र पर हस्‍ताक्षर करता है। इसके पश्‍चात कार्यपूर्णत: प्रमाणपत्र एस्‍डीओं के पास हस्‍ताक्षर के लिए भेजा जाता है। कार्य पूर्णत: प्रमाणपत्र प्रदर्श डी-8 पर तत्‍कालीन कस्‍तूरी सचिव ने हस्‍ताक्षर कर दिए थे।
आवेदक का आवेदन संक्षेप में इस प्रकार है कि आवेदक को प्रकरण में पुलिस द्वारा झूठा फंसाया जा रहा है, वह इंदौर का मूल निवासी होकर इंदौर में ही मोबाईल रीचार्ज की दुकान लगाकर अपना व्‍यवसाय कर रहा है जहां अभियोत्री का आना-जाना जारी था, इसी आधार पर आरोपी को झूठा फंसाया गया है। आवेदक का घटना से प्रत्‍यक्ष या अप्रत्‍यक्ष रूप से कुछ भी संबंध नहीं है। ना ही उसने कोई संड़यंत्र कर घटना की है, अभियोत्री वालिग होकर अपना भला-बुरा समझती है। आवेदन प्रतिभूति प्रस्‍तुत करने को तत्‍पर है। प्रकरण में अभियोत्री के बरामदगी सहआरोपी असलम से की जा चुकी है। आवेदक से कोई बरामदगी नहीं होना है। आवेदक द्वारा साक्ष्‍य विगाड़ने की कोई संभावना नहीं है, अग्रिम प्रतिभूति देने पर वह अनुसंधान में पूर्ण सहयोग करेगा।
            अभियोजन साक्षी 5 जोकि मेडिकल विशेषज्ञ है, की साक्ष्‍य से स्‍पष्‍ट हो रहा है कि घटना दिनांक को मामले की फरियादिया को चोटे आई थी इस प्रकार मामले की फरियादिया की साक्ष्‍य की संपुष्टि मेडिकल साक्ष्‍य से हो रही है। प्रकरण में आरोपी की ओर से जो बचाव साक्ष्‍य प्रस्‍तुत की गई है, उसके अवलोकन से प्रकट हो रहा है कि आरोपी ने यह बचाव दिया है कि पैसे के लेन-देन के विवाद के कारण रिपोर्ट की गई है। यह पर यह भी उल्‍लेखनीय है कि दोनों बचाव साक्षी आरोपी के सगे-संबंधी है और निश्चित रूप से हितबद्ध साक्षी है। यहां पर यह भी उल्‍लेखनीय है कि कोई भी महिला ना तो पैसे के लेन-देन पर विवाद के कारण दहेज संबंधी रिपोर्ट कर  अपना पारिवारिक जीवन नष्‍ट नहीं करेगी। इस प्रकार आरोपी की ओर से ली गई बचाव पर विश्‍वास करने का पर्याप्‍त आधार प्रकरण में विद्यमान नहीं है।
            प्रकरण में आई हुई साक्ष्‍य से यह स्‍पष्‍ट हो रहा है कि अरोपी का दिमाग का इलाज चल रहा है। उक्‍त तथ्‍य के बारे में ना केवल फरियादिया बल्कि अन्‍य सभी साक्षी गण ने अपनी साक्ष्‍य में कथन किया है।

Monday, 23 April 2018

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प्रकरण में यह भी विर्वविवादित है कि सड़कनिर्माण हेतु 4 लाख रूपए स्‍वीकृत हुएथे जिसकी स्‍वीकृत सरपंच के ही अधीन थी कार्य के प्रारंभ में उपयंत्री ही ले आऊट बनाता है और मार्गदर्शन देता है इसके पश्‍चात कार्य पूणत: प्रमाणपत्र पर कार्य हो जाने के उपरांत सचिव एमआईएस के आधार पर केशबुक में जानकारी भरता है हस्‍ताक्षर करता है, पश्‍चात सरपंच कार्यपूर्णता: प्रमाणपत्र पर हस्‍ताक्षर करता है और  उसे उपयंत्री के पास भेजा जाता है उपयंत्री भौतिक सत्‍यापन करते हुए प्राकलन करके कार्य पूर्णत: प्रमाणपत्र पर हस्‍ताक्षर करता है। इसके पश्‍चात कार्यपूर्णत: प्रमाणपत्र एसडीओ के पास हस्‍ताक्षर के लिए भेजा जाता है। कार्य पूर्णत: प्रमाणपत्र प्रदर्श डी-8 पर तत्‍कालीन सरंपच कस्‍तूरी तथा सचिव ने हस्‍ताक्षर कर दिए थे। आवेदक का आवेदन संक्षेप में इस प्रकार है कि आवेदक को प्रकरण में पुलिस द्वारा झूठा फंसाया जा रहा है, वह इंदौर का मूल निवासी होकर इंदौर में ही मोबाईल रिचार्ज की दुकान लगाकर अपना व्‍यवसाय कर रहा है जहां अभियोत्री का आना-जाना जारी था, इसी आधार पर आरोपी को झूठा फंसाया गया है। आवेदक का घटना से प्रत्‍यक्ष या अप्रत्‍यक्ष रूप से कुछ भी संबंध नहीं है ना ही उसने कोई सड़यंत्र कर घटना की है, अभियोत्री बालिक होकर अपना भला-बुरा समझती है। आवेदक प्रतिभूमि प्रस्‍तुत करने को तत्‍पर है। प्रकरण में अभियोत्री की बरामदगी सह-आरोपी असलम से की जा चुकी है। आवेदक से कोई बरामदगी नहीं होना है। आवेदक द्वारा साक्ष्‍य विगाड़ने की कोई संभावना नहीं है, अग्रिम प्रतिभूति देने पर अनुसंधान में पूर्ण सहयोग करेगा।
            अभियोजन साक्षी 5 जो कि मेडिकल विशेषज्ञ है कि साक्ष्‍य से स्‍पष्‍ट हो रहा है कि घटना दिनांक को मामले की फरियादिया को चोटे आई थी। इस प्रकार मामले की फरियादिया की साक्ष्‍य की सपुष्टि मेडिकल साक्ष्‍य से हो रही है। प्रकरण में आरोपी की ओर से जो बचाव साक्ष्‍य प्रस्‍तुत की गई है, उसके अवलोकन से प्रकट हो रहा है आरोपी ने बचाव लिया है कि वैंसे लेन देन के विवाद के कारण रिपोर्ट की गई है।  यहां पर यह भी उल्‍लेखनीय है कि दोनों बचाव साक्षी आरोपी के सगे-संबंधी है और निश्चित रूप से हितबद्ध साक्षी है। यहां पर यह भी उल्‍लेखनीय है कि कोई भी महिला मात्र पैसे के लेन-देन पर विवाद के कारण दहेत संबंधी रिपोर्ट पर अपना पारिवारिक नष्‍ट नहीं करेगी। इस प्रकार आरोपी की ओर से ली गई बचाव पर विश्‍वास करने का पर्याप्‍त आधार प्रकरण में विद्यमान नहीं है।
            प्रकरण में आई हुई साक्ष्‍य से यह स्‍ष्‍ट हो रहा है कि आरोपी का दिमाग का इलाज चल रहा है। उक्‍त तथ्‍य से बारे में ना केवल फरियादिया बल्कि अन्‍य सभी साक्षीगण ने अपनी साक्ष्‍य में कथन किया है।

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वादी का वाद संक्षेप में इस प्रकार है कि वादी के अनुसार उक्‍त विवादित भूमि प्रतिवादी के स्‍वामित्‍व की भूमि है। वादी के अनुसार प्रतिवादी को अपनी आवश्‍यकताओं की पूर्ति के लिए पैसों की जरूरत थी तथा उसने उक्‍त विवादित भूमि को विक्रय करने का अनुबंध वादी से किया था। तथा उसी दिनांक को वादी से रूपए प्राप्‍त करके वादी के हित में एक विक्रय अनुबंध पत्र उपपंजीयक के कार्यलय में पंजीबद्ध करा दिया था एवं यह तय हुआ था कि जिस दिन वादी कहेगा एक वर्ष के भीतर उक्‍त भूमि का विक्रय पत्र का पंजीयन वादी के हित में प्रतिवादी करा देगा तथा शेष बची हुई रकम को  वह वादी अदा कर देगा। वादी के अनुसार प्रतिवादी के मन में वदनियति आ गई तथा वह 200 रूपए प्राप्‍त नहीं कर रही है और ना ही वह विक्रय पत्र का पंजीयन  वादी के पक्ष में कर रही है। वादी के अनुसार  उसने जो प्रतिवादी को यह बोला कि शेष राशि प्राप्‍त कर लो एवं विक्रय पत्र निष्‍पादित करा लो तथा विवादित भूमि का कब्‍जा सौंप दो, तब प्रतिवादी ने यह कहते हुए मना कर दिया कि उसने कोई अनुबंध पत्र वादी के हित में नहीं लिखा। इस प्रकार प्रतिवादी विक्रय अनुबंध पत्र का पालन नहीं कर सका। जबकि वह करने के लिए तैयार है। अत: उपरोक्‍त आधारों पर वादी ने इस आशय की डिक्री चाही है कि उक्‍त विवादित भूमि से संबंधित विक्रय अनुबंध पत्र का पालन कराते हुए प्रतिवादी को 2000 रूपए दिलाकर विक्रय पत्र का पंजीयन वादी के हित में सम्‍पादित कराया जावे। और साथ ही विवादित भूमि का कब्‍जा वादी को दिलाया जावे।
            उक्‍त वादपत्र के जबाव में प्रतिवादी द्वारा वादी के वादपत्र में किए गए अभिवचनों को पूर्णत: अस्‍वीकार किया गया है। प्रतिवादी के अनुसार वादी द्वारा गलत आधारों पर वाद पत्र प्रस्‍तुत किया गया है। प्रतिवादी द्वारा अपने जबाव में अभिवचित किया गया है कि उसने कोई अनुबंध पत्र की  लिखापढ़ी नहीं की और ना ही प्रतिफल पाया। प्रतिवादी के अनुसार उक्‍त अनुबंधपत्र फर्जी व शूल्‍य है प्रतिवादी के अनुसार उसने कोई राशि प्राप्‍त नहीं की और ना ही उसे प्राप्‍त करना शेष है। अत: उपरोक्‍त आधारों पर प्रतिवादी द्वार वादी के वाद पत्र को अस्‍वीकार कर निरस्‍त करने का अभिवचन किया गया है।
            वादी साक्षी ने अपने कथन में बताया है कि वह प्रतिवादी को जानता है। उक्‍त साक्षी के अनुसार प्रतिवादी को पैसों की आवश्‍यकता थी और उसने उक्‍त विवादित भूमि विक्रय करने का अनुबंध दिनांक को उससे किया था और उसी दिनांक को 2 लाख रूपए उससे  प्रापत किए। उक्‍त साक्षी के अनुसार उक्‍त विक्रय अनुबंध पत्र उपपंजीयक के कार्यलय में गवाहों कें समक्ष निष्‍पादित हुआ था तथा यह  तय हुआ था कि शेष 20 हजार रूपए प्रतिवादी उससे प्रापत कर एक वर्ष के भीतर विक्रय पत्र का पंजीयन करवा देगी।

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इस आदेश द्वारा वादीगण द्वारा प्रस्‍तुत आवेदन अंतर्गत आदेश 23 नियम 1 का निराकरण किया जा रहा है। वादीगण द्वारा प्रस्‍तुत आवेदन संक्षेप में इस प्रकार है कि प्रस्‍तुत वाद की विषय वस्‍तु के संबंध में वादीगण का प्रतिवादी से राजीनामा हो गया है तथा प्रतिवादी ने न्‍यायालय के बाहर अस्‍वस्‍थ कर दिया है कि वह विवादित संपत्ति के विक्रय करने की दशा में हम वादीगण की सहमति प्राप्‍त करेगा। इस आपसी सहमति के आधार पर वादीगण उक्‍त प्रकरण को अब आगे नहीं चलाना चाहते है तथा विवाद होने पर पुन: वादपत्र पेश करने की स्‍वतंत्रता रखते हुए इसी प्रक्रम पर वाद समाप्‍त किए जाने का निवेदन किया है।
            प्रतिवादी द्वारा मौखिक रूप से प्रकट किया गया है कि उसका वादीगण से इस प्रकरण में विवादित सम्‍पत्ति   के संबंध में न्‍यायालय के बाहर राजीनामा हो गया है। एवं उसे वादीगण द्वारा प्रस्‍तुत उक्‍त आवेदन से कोई आपत्ति नहीं है। प्रकरण का अवलोकन किया गया। प्रकरण के अवलोकन से विविध है कि वादीगण द्वारा उक्‍त दिनांक को प्रस्‍तुत वाद प्रतिवादी के विरूद्ध आदेशात्‍मक स्‍थाई निषेधाज्ञा हेतु संस्‍थित किया गया था। वादीगण एवं प्रतिवादी द्वारा संयुक्‍त रूप से पूर्व में एक आवेदन राजीनामा हेतु अंतर्गत आदेश 30 नियम 3 प्रस्‍तुत किया गया था जो न्‍यायालय द्वारा इस आधार पर निरस्‍त किया गया था कि उक्‍त राजीनामा विधि विरूद्ध उद्देश्‍य पर आधारित है।
            वादीगण द्वारा प्रस्‍तुत आवेदन वाद के परित्‍याग हेतु प्रस्‍तुत किया गया है जिसमें यह प्रकट किया गया है कि वादीगण एवं प्रतिवादी के मध्‍य राजीनामा हो गया है। इसलिए वे प्रस्‍तुत प्रकरण को आगे नहीं चलाना चाहते है। सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 23 नियम 1 उपनियम 1 के अनुसार वाद संस्थित किए जाने के पश्‍चात वादी प्रतिवादी या उनमें से किसी के भी विरू अपने वाद का परित्‍याग या अपने दावे के भाग का परित्‍याग कर सकेगा। वादीगण द्वारा उक्‍त आवेदन में प्रस्‍तुत प्रकरण को परित्‍याग किए जाने हेतु न्‍यायालय की अनुमति चाही गई है। वादीगण द्वारा अपने आवेदन में यह भी व्‍यक्‍त किया है कि पुन: विवाद होने की स्थिति में वादपत्र पेश करने की स्‍वतंत्रता रखते हुए वाद पत्र बापस प्राप्‍त करना चाहता है। और वादी द्वारा नया वाद कारण उत्‍पन्‍न होने की दशा में नया वाद प्रस्‍तुत करने की अनुमति प्राप्‍त करने का  निवेदन किया है परंतु आदेश 23 नियम 1 के अनुसार वादी उक्‍त आदेश के अंतर्गत केवल प्रकरण में उत्‍पन्‍न वाद कारण के संबंध में नया वाद संस्थित किए जाने की अनुमति प्राप्‍त कर सकता है। नये वाद कारण के लिए नये वाद को संस्थित किए जाने के लिए न्‍यायालय की अनुमति की आवश्‍यकता नहीं होती। जब वादी प्रकरण को आगे नहीं चलाना चाहता, वहां न्‍यायालय वादी को प्रकरण चलाने के लिए वाध्‍य नहीं कर सकता।

70 WPM

चेयरमेन साहब मैं आपसे कहना चाहता हूँ कि हम लोग देख रहे है कि गरीबी सबके लिए नहीं है कुछ लोग तो देश में इस तरह से पनप रहे है‍ कि उनकी संपत...