Friday, 2 February 2018

50 WPM Hindi Dictation for High Court, SSC, CRPF, Railways, LDC Exam Post-262 Legal Matter

50 WPM Hindi Dictation for High Court, SSC, CRPF, Railways, LDC Exam Post-262 Legal Matter

कुल शब्‍द 500 समय 10 मिनिट - 

                भाजपा में 2014 के चुनाव अभियान के दौरान यही सब थोड़े फेर बदल के साथ हो रहा है। कांग्रेस के विपरीत भाजपा कार्यकर्ता आधारित पार्टी रहीं है जिसे आर एस एस से ताकत मिलती है। मोदी के उदय में कार्यकर्ताओं को कुछ इस तरीके से उत्‍साहित किया कि भाजपा नेता व पूर्व प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी नहीं कर पाये। हालंकि जहां पार्टी कार्यकर्ता तो उत्‍साह में आ गये है, शेष भाजपा नेतृत्‍व हासिए पर ढकेला जा रहा है। षष्‍ठम अपर सत्र न्‍यायाधीश मोहम्‍मद सलमान खान ने हत्‍या के आरोपी को उम्र कैद की सजा सुनाई। अतिरिक्‍त लोक अभियोजक रविकांत शराफ ने बताया कि प्राथी किरन बाई बाघराज वार्ड तिली वार्ड स्थित टोरिया में रहती है उनके दो लड़के ऋषि व ऋषभ व एक लड़की  है। 18 जुलाई 2013 को उसका पति बलराम रैंकवार किसानी के लिए ग्राम करैया गया था। उसी दिन रात को वह अपनी लड़की को डॉक्‍टर के यहां से दिखा कर लौट रही थी। उसके साथ दोनों लड़के थे।
        लगातार सुख सुविधाएं प्राप्‍त होने वाले इस युग में जिन जिन चीजों की बढोत्‍तरी हुई उसमें एक है भेद भाव। सुख के साथ शांति नहीं मिलने का एक कारण होता है कि मनुष्‍य, मनुष्‍य से अत्‍याधिक भेद करने लगता है। प्रतिस्‍पर्धा हो इसमें कोई दिक्‍कत नहीं। महत्‍वाकांक्षा और प्रतिस्‍पर्धा कभी कभी मनुष्‍य के पुरूषार्थ में और मदद करती है। आलस्‍य पर प्रभाव भी इन दोनों के कारण हो जाता है लेकिन जब लंबे समय महत्‍वाकांक्षा और प्रतिस्‍पर्धा की बृद्धि मनुष्‍य के भीतर रहती है।
        आरोपी होती लाल ऋषभ को टीवी देखने का कहकर अपने साथ ले गया। जब रात में वह बापस घर नहीं आया तो सुबह मां किरन बाई उसे देखने आरोपी के घर गई। आरोपी से पूछने पर संतोषप्रद जबाव नहीं मिला। किरन बाई ने होकर अपने घर बापस आ गई। उसी दौरान मुहल्‍ले में चर्चा चल रही थी कि शमशान घाट में एक बोरे में लाश पड़ी है इसके बाद किरन बाई शमशान घाट पहुंची और बोरा देखा, तो लाश उसके लड़के ऋषभ की ही थी।
        योग्‍यता और अयोग्‍यता में भेद शिक्षा और अशिक्षा में भेद, अमीर और गरीब में भेद, ईमानदार और बेईमान में भेद और तो और रिश्‍तों में भी भेद, शुरूा हो जाते है। पति पत्नि का भेद, भाई-भाई का भेद, अशांति का बहुत बड़ा भेद हो जाता है। भेद आखिर में ईर्ष्‍या लेकर आता है। परमात्‍मा से संसार बनाया तो प्रतिस्‍पर्धा के लिए छूट दी है, लेकिन भेद भी पंसद नहीं है और ना ही हमारा ऐसा व्‍यवहार उसे पसंद आता है। भाजपा में 2014 के चुनाव अभियान के दौरान यही सब थोड़े फेरबदल के साथ हो रहा है। कांग्रेस के विपरीत भाजपा कार्यकर्ता आधारित पार्टी रही है, जिसे आर एस एस से ताकत मिलती है। मोदी के उदय ने कार्यकर्ताओं को कुछ इस तरीके से उत्‍साहित किया कि शायद भाजपा नेता व पूर्व प्रधान मंत्री अटल बिहारी बाजपेयी भी नहीं कर पाये। हालांकि, जहां पार्टी कार्यकर्ता तो उत्‍साह में आ गये है, शेष भाजपा नेतृत्‍व हासिए पर धकेला जा रहा है।

45 WPM Hindi Dictation for High Court, SSC, CRPF, Railways, LDC Exam Post-261 Legal Matter

45 WPM Hindi Dictation for High Court, SSC, CRPF, Railways, LDC Exam Post-261 Legal Matter
कुल शब्‍द 459

अपीलकर्ता ने एक आपराधिक मामले  के अंतरण का आवेदन किया था, जो जिला जज के न्‍यायालय में लंबित था। अपीलकर्ता को उस न्‍यायाधीश से ऋजुहीन विचारण की आशंका हो गई थी। यह निर्धारित किया गया कि यह आशंका निराधार नहीं थी, क्‍योंकि उसी न्‍यायाधीश ने एक दीवानी मुकदमें जिसमें अपीलकर्ता एक पक्षकार रूप में अंतर्गस्‍त था वकील की फीस की रूप में एक लंबी धनराशि खर्च के रूप में स्‍वीकृत की गई थी। अत: अंतरण आवेदन स्‍वीकृत कर दिया गया। परंतु जहां उसका अंतरग्रस्‍त विचारण न्‍यायाधीश करते समय सेवा निवृत्‍त हो गया हो और उसके स्‍थान पर पुर्नविचारण अन्‍य न्‍यायाधीश ने कर्तव्‍य भार संभाल लिया हो (वहां मामले को किसी अन्‍य मामले के समक्ष) अं‍तरित करने का प्रश्‍न नहीं उठता। इस तरह के मामले में यह निर्देश दिया जा सकता है कि विचारण न्‍यायालय मामले का निपटारा शीघ्रकर दिन-प्रतिदिन विचारण करे।
        सरकार के एक पूर्व मंत्री को भ्रष्‍टाचार निवारण अधिनियम, 1947 की धारा 5 घ के अधीन अभियोजित और दण्डित किया गया था। उच्‍च न्‍यायालय ने अपील की लंबितावस्‍था में अपनी अपील को अंतरित करने का निवेदन किया गया। उसका यह कहना था कि उसको ऋजु विचारण और न्‍याय की आंशका है। क्‍योंकि राज्‍य सरकार और प्रेस द्वारा उसेक विरूद्ध दुष्‍प्रचार किया जा रहा है। और संभवत: उससे जाने अंजाने में न्‍यायाधीश प्रभावित हो सकते है। इस तरह आपत्ति को उसने अपील फाइल करने के चार वर्ष बाद उठाया थ। इस विलबं के कारण उसकी दलील को खारिज कर दिया गया और यह कहा गया कि कार्यपालिका से न्‍यायपालिका की पूर्ण प्रथकता के कारण न्‍यायाधीश किसी भी प्रकार से दुष्‍प्रचार से प्रभावित नहीं होते।
        पक्षकारों की कठिनाईयों को हल्‍का करने के उद्देश्‍य  से मुख्‍य न्‍यायायिक मजिसट्रेट मुजफ्फरनगर में स्‍थानांतरित कर दिया गया जहां दूसरा प्रकरण भी लंबित था। न्‍यायालय की कार्यवाहियों में हाजिर होने के लिए परिवादी की कठिनाई को दृष्टिगत रखते हुए उपस्थित रहने की अनुमति भी प्रदान कर दी गई    एक मामले को तमिलनाडु की सेशन न्‍यायालय से ड्रिस्‍ट्रिक एंड सेशज जज पांडिचेरी को अंतरित करने का आदेश दिया गया क्‍योंकि अभियोजन अधिकरण के कारण से अपीलकर्ता अभियुक्‍त के मष्तिष्‍क मे इस बात की एक युक्तियुक्‍त आशंका उत्‍पन्‍न हो गई थी कि यदि उसका विचारण उसी राज्‍य में किया जाता है तो वह न्‍यायरहित हो जायेगा उसे न्‍याय नहीं मिल सकेगा। मामलों और अपीलों को अंतरित करने की जो शक्ति उच्‍चतम न्‍यायालय को अभिप्राप्‍त है, उसका प्रयोजन अभियुक्‍त को ऋजु विचारण सुनिश्चित करता है।
पक्षकारों की कठिनाईयों को हल्‍का करने के उद्देश्‍य  से मुख्‍य न्‍यायायिक मजिसट्रेट मुजफ्फरनगर में स्‍थानांतरित कर दिया गया जहां दूसरा प्रकरण भी लंबित था। न्‍यायालय की कार्यवाहियों में हाजिर होने के लिए परिवादी की कठिनाई को दृष्टिगत रखते हुए उपस्थित रहने की अनुमति भी प्रदान कर दी गई

उसका प्रयोजन अभियुक्‍त को ऋजु विचारण के लिए सुनिश्चित करता है।

Hindi Dictation Post1 सुप्रीम कोर्ट ने सोशल जस्टिस

40WPM
Total Words 437

सुप्रीम कोर्ट ने सोशल जस्टिस से जुड़े मामलों के लिए एक अलग विशेष बेंच बनाने का फैसला लेकर न्यायपालिका की एक अहम जिम्मेदारी को रेखांकित किया है। जनहित याचिकाओं की शक्ल में आए ऐसे तमाम मामले बाकी हजारों मुकदमों के बीच अलग-अलग बेंचों में लंबित पड़े हैं। अदालत ने महसूस किया कि इन मामलों की बारीकी को समझने और इन्हें जल्दी किसी नतीजे तक पहुंचाने के लिए एक खास सामाजिक दृष्टि की जरूरत है।
ये ऐसे मामले हैं जो महिलाओं बच्चों और समाज के अन्य कमजोर तबकों के हितों और उनके अधिकारों से जुड़े हैं। ऐसे मामले अगर समय पर अदालत का ध्यान नहीं खींच पाते तो कमजोर तबकों के संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन का खतरा पैदा हो जाता है। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट में लंबित ऐसे करीब 200 मामलों में से65 पर सुनवाई नई स्पेशल बेंच में शुरू की जाएगी। आगे चल कर वे मामले भी इस बेंच को स्थानांतिरत किए जा सकते हैंजिन पर दूसरी बेंचों में सुनवाई पहले ही शुरू हो चुकी है।

बहरहालसामाजिक न्याय को आगे बढ़ाने में यह बेंच कैसी भूमिका निभाती हैयह तो तब स्पष्ट होगा जब बेंच अपना काम शुरू करेगी और इसके फैसले आने लगेंगे। अभी जो कुछ प्रमुख मुकदमे इस बेंच के सामने आने वाले हैंउनका जिक्र भी इसकी प्रकृति के बारे में एक राय बनाने के लिए काफी है। एक अहम मुकदमा इस बारे में है कि गोदामों में पड़े सरप्लस अनाज के भंडार को क्यों न सूखाग्रस्त क्षेत्रों के लोगों में बंटवाने की व्यवस्था की जाए।
ऐसे ही बेघरों के लिए आश्रय स्थल सुनिश्चित करवानेपौष्टिक भोजन के अभाव में महिलाओं और बच्चों की असामयिक मौत रोकने की व्यवस्था करनेसभी नागरिकों को (चाहे उनकी आर्थिक स्थिति कैसी भी हो) स्वास्थ्य संबंधी सुविधाएं मुहैया कराने जैसे मुद्दे भी इन जनहित याचिकाओं में उठाए गए हैं। साफ है कि ये तमाम मुद्दे सरकार की ऐसी जिम्मेदारियों से जुड़े हैंजिनकी अनदेखी करने का चलन इधर बढ़ता जा रहा है। अगर सुप्रीम कोट की ताजा पहल इस चलन पर अंकुश लगा सकी तो इससे भारतीय लोकतंत्र की जमीन मजबूत होगी।


जरा सोचिये देश में जब कभी भी आम या स्थानीय स्वराज (के चुनाव होते हैं तब कितने प्रतिशत मतदान होता है ? ४० %,५० % या फिर कभी कभार ६० % . इससे अधिक मतदान बहुत काम बार होता है। इसके बाद जिस दल की सरकार बनती है उसको मिलने वाले वोटों का प्रतिशत भी २० प्रतिशत से अधिक नहीं होता। यानि कि सरकार उनकी बनती है जिसे मात्र २० प्रतिशत लोगों का समर्थन हासिल हो। यहाँ विडम्बना है। और यहाँ विडम्बना इसलिए भी है  क्‍योंकि लोग वोट देना ही नहीं चाहते।

Thursday, 1 February 2018

50 WPM Hindi Dictation for High Court, SSC, CRPF, Railways, LDC Exam Post 260 Matter Link

पार्ट 260 
कुल शब्‍द 508 समय 10 मिनिट (58 WPM)

50 WPM Hindi Dictation for High Court, SSC, CRPF, Railways, LDC Exam Post 260 Matter Link

वर्ल्‍ड इॅकोनॉमिक फोरम के जेंडर गेप इंडेक्‍स में भारत 21 पायदान नीचे आ गया है। फोरम ने 144 देशों में भारत को 108वें नम्‍बर पर रखा है। पिछले साल 87वें नम्‍बर पर था स्त्री पुरूष में आर्थिक और राजनीतिक असमानता बढ़ना इसकी प्रमुख वजह है। फोरम चार पैरामीटरों पर यह रैंकिंग करता है। इनमें से दो में प्रदर्शन खराब हुआ है। बाकी दो पैमाने पर भी सिफ एक एक अंक का सुधार है। राजनीतिक अधिकार में  भारत पन्‍द्रहवे नम्‍बर पर है। अर्थव्‍यवस्‍था में महिलाओं की कम भागीदारी और मामूली वेतन के चलते भारत रैकिंग में चीन और बांग्‍लादेश से भी पिछड़ गया है। डब्‍ल्‍यू.ई.एफ की ग्‍लोबल जेंडल गैप रिपोर्ट 2017 के मुताबिक भारत ने महिला और पुरूषों के मामले में 67 फीसदी अंतर बांटने में सफलता हासिल की है। लेकिन यह सफलता  चीन और बांग्‍लादेश से भी फीकी है। इस इंडेक्‍स में बांग्‍लादेश 47वें और चीन 100वें स्‍थान पर रहा। भारत की रैकिंग 2006 के मुकाबले 10 पायदान गिरी है। यह इंडेक्‍स  2006 में ही शुरू किया गया था। इंडेक्‍स की शुरूआत से पहली बार पूरी दुनिया में जेंडर गैप के मामले में हालात सुधरने के बजाह बिगड़ी है। खासकर शिक्षा, कार्यस्‍थल और राजनीति इन चारो क्षेत्रों में महिला व पुरूषों के बीच खाई और चौड़ी हुई है।

         भारत 141वें स्‍थान पर है। भारत से नीचे सिफ 3 देश है अजर बेजान आर्मेनिया चीन। आश्‍चर्य जनक रूप से चीन सबसे नीचे है। भारत में पांच साल से कम की एक लाख बच्चिचयों में से 595 मर जाती है। 587 महिलाओं की मौत संकमण रोगों से होती है। भारत पन्‍द्रहवें स्‍थान पर है। भारत का स्‍थान संसद में रिप्रजेन्‍टेशन के मामले में 188वां और मंत्री बनने के मामले में 76वां स्‍थान है। 1966 में यहां पहली बार महिला पीएम बनी  टॉप 20 देशों में बने रहने के लिए नई पीढि़ को आगे आना होगा। भारत 139वें स्‍थान पर है। भारत में महिलाएं रोज औसतन 537 मिनिट काम करती है। पुरूष 442 मिनिट महिलाओं को 66% और पुरूषों को 12% काम के पैंसे नहीं मिलते। महिलाओं की औसत सैलरी 5400 रूपए और पुरूषों की 8100 रूपए है शिक्षा के क्षेत्र में भारत 112वें स्‍थान पर है प्राथमिक और सेंकेंडरी ऐजुकेशन में भर्ती के मामले भारत नम्‍बर 1 है। 40% व्‍यस्‍क महिलाओं और 62% पुरूषों के पास प्राईमरी एजुकेशन है। सेंकेंडरी एजुकेसन में महिलओं का एवरेज 19.4% और हायर एजुकेशन 6.7% है। इकोनॉमिक कोऑरेशन और हेल्‍थ में भारत 100 से नीचे ही है। वर्ल्‍ड लेवल पर स्‍त्री पुरूष में असमानता भी बड़ी है। जेंडर गैप रैंकिंग के ग्‍यारह साल के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ 2016 की रिपोर्ट में कहा गया था कि इस अंतर को बांटने में 83 साल लगेगे। लेकिन नई रिपोर्ट के मुताबिक अब इसमें सौ साल लग जायेगे। सैलरी का अंतर को इतना ज्‍यादा है कि इसे खत्‍म होने में 217 साल लगेगे। राजनीतिक असमानता दूर करने में 99 साल और शैक्षिक असमानता हटाने में 13 साल का वक्‍त लगेगा। फोरम में एजुकेशन और जेंडर डिपार्टमेंट की शादिया जाहिदी ने कहा कि बड़े देशों ने असमानता कम करने की रफतार बड़ी है। 

55 WPM – 60 WPM Hindi Dictation for High Court, SSC, CRPF, Railways, LDC Exam Post 259 Matter Link

 पार्ट 259

कुल शब्‍द 580 समय 10 मिनिट (58 WPM)

55 WPM – 60 WPM Hindi Dictation for High Court, SSC, CRPF, Railways, LDC Exam Post 259 Matter Link

नोटबंदी के एक साल पूरा होने पर फायनेंस मिनिस्‍टर अरूण जेटली मंगलवार को प्रेस कांफ्रेंस करेगे। इसके पहले उनहोंने ब्‍लाग लिखकर सरकार के इस फेसले से हुए फायदे गिनाए। बता दे कि पिछले साल आठ नवम्‍बर को मोदी सरकार ने पांच सौ और एक हजार रूपए के नोट चलन से बाहर करने का एलान किया था। तब केन्‍द्र की ओर से कहा गया था कि यह फैसला काले धन, जाली कंरसी और टेरर फंडिंग पर रोक लगाने के लिए लिया गया है। उधर, कांग्रेस नोटबंदी को फेल बताती रही है और बुधवार को काला दिवस मनायेगी। प्रेस कांफ्रेंस में अरूण जेटली ने यह भी कहा कि नोटबंदी का फैसला अभूतपूर्व था।  सरकार ने इसके जरिए अर्थव्‍यवस्‍था के भविष्‍य को बदलने का काम किया है। जेटली ने यह भी कहा कि लूट तो 2जी कॉमनवेल्‍थ और कोयला घोटाले में हुई इससे पहले गुजरात में प्रेस कांफ्रेंस में मनमोहन सिंह ने नोटबंदी को सरकार की आर्गनाइज्‍ड लूट बताया था। जेटली ने कहा सरकार का यह आदेश हुआ था कि बड़े नोट है वो लीगल टेंडर नहीं रहेगे। कुछ वक्‍त के लिए कुछ चीजों केलिए उस करंसी का प्रयोग हो सकता था। इसके बाद रिजर्व बैंक ने नई करंसी अनाउंस की थी। यह एक वाटर शेड मूवमेंट था हमारी अर्थव्‍यवस्‍था के लिए। पूरे साल इस पर चर्चा होती रही। वीजेपी की ओर से हम सब लोग यह मानते है कि देश की अर्थव्‍यवस्‍था और देश के व्‍यापक भविष्‍य के लिए जो यर्थाथ था उसे बदलना था। किसी भी अर्थव्‍यवस्‍था मे कैश का डोमिनेशन 12.2 फीसदी हो और उसमें भी 86 फीसदी बड़े नोट हो। एक स्‍वाभाविक विचार है कि अगर कैश ज्‍यादा होता तो टेक्‍स इवीजन ज्‍यादा होता है। इससे यह सिद्ध हेाता है कि जो टेक्‍स देता है उसका टेक्‍स  भी देता हो जो टेक्‍स नहीं देता। यानी वो दोहरा कर देता है।  क्‍योंकि टेक्‍स तो देना ही है इसलिए साधन सम्‍पन्‍न आदमी जब साधन को जेब में रख लेता है तो यह अन्‍याय है। क्‍योंकि यह गरीब का हक है।
         राजनीतिक व्‍यवस्‍था में जब ज्‍यादा कैश होता है तो ये एक भ्रष्‍टाचार का केन्‍द्र और कारण बनता है। लेकिन, इस पर रोक लगाना कठिन हेाता है। सरकान ने एक के बाद एक कदम उठाये। एसआईटी ब्‍लेक मनी लॉ, विदेशों से रिटी को संशोधित करना ट्रांसपेंरेसी ज्‍यादा लाना। खर्च  किस तरह से उस पर कंडीशन लगाना, बेनामी कानून लाना। इन डारेक्‍ट व्‍यवस्‍था बदलना। इसके कई स्‍वाभाविक परिणाम हमने साल भर मे  देखे है। कैश का बैंको के अंदर जाना। इसलिए चाहे उसका एक्‍सपेंडेचर म्‍यूच्‍यूअल फंड में हो इन्‍श्‍योरेंस में हो। इस सब क्षेत्रों में अगर हम देखे तो पिछले एक साल मे रिसोर्स बड़े है। बैंको के पास पैसा आया। फार्मल इॅकोनामी में सुधार आया। नोटबंदी हर समस्‍या का हल नहीं है लेकिन, इसने एंजेडा बदला। इससे हमें देश को फार्मल इॅकानामी और लेस कैश की तरफ ले जाने में कामयाब हुई।‍ रिमानेटाईजेशन भी कुछ महीनों में कर दिया गया यह विशव के सामने अद्भुत उदाहरण है।
         कांग्रेस की तरफ से विशेष रूप से विरोध किया गया दस साल तक पॉलिसी पैरालिसिस था कुछ नहीं किया गया। प्रधानमंत्री जी ने एक स्‍ट्रकच्‍लरल रिफार्म करके बदलाव लाने का प्रयास किया है। जेटल जी ने कहा, यूपीए और एनडीए में एक मूलभूत अंतर है। एक जगह पॉलिसी पैरालिसिस दिखता है जो दूसरी तरफ स्‍ट्रक्‍चरल रिफार्म । हैरानी इस बात की है कि हम नैतिक रूप से सही कदम उठा रहे है। और उसको लूट कहना।
         हमने काले धन के खिलाफ कार्यवाही की यह सैदांतिक तौर पर सही है।

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पार्ट 256

कुल शब्‍द 502 समय 10 मिनिट

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जोसेफ हेलर के प्रसिद्ध उपन्‍यास केच-22 में लेफिटिनेंट माइलो मांईडर वांईडर का चरित्र खुद से कारोबार करके ख्‍याति अर्जित करता है वह खुद से इस तरह कारोबार करता कि लेनदेन के चक्र में शामिल हर व्‍यक्ति को मुनाफा होता तो अंतत: सरकार की जेब से ही आता है। वह किसी चीज की पूरी सप्‍लाई खरीद लेता जैसे एक गांव के सारे अंडे टमाटर खरीद लिए और फिर अपनी ही फौजी यूनिट को मनमाने दाम पर बेंच दिए। अफवाद सिफ एक था जब उसने दुनिया का सारा मिस्‍त्री कपास खरीद लिया। कोई खरीददार ही नहीं बचा किसी ने उससे खरीदा तो उसे ही वापस भेज दिया। मोनोपॉली व्‍यापारी बनकर उसने मिस्‍त्र कपास का बाजार खत्‍म कर दिया जिसमें वह स्‍वयं भी था पर उसने रास्‍ता निकाल ही लिया कि क्‍यों ना इसे सरकार को बेच दिया जाए। अब माइलो मांईडर वांईडर की जगह 1979 के बाद की भारत सरकार और मिस्‍त्री कपास की जगह भारतीय बैंक लाईये। इदिरा गांधी पहले तो भारत के प्रमुख बैंको का राष्‍ट्रीयकरण करती है और बैंकिंग तथा फाइनेंस में राज्‍य का एकाधिकार स्‍थापित करती है। क्‍योंकि इसके पास सारी बीमा कंपनियों व विकासात्‍मक वित्‍तीय संस्‍थानों (पूर्ववर्ती आईसीआईसीआई, आईडीबीआई,  आईएफसीआई आदि) का भी स्‍वामित्‍व है। फिर यह खुद से खरीदना शुरू करती है। बैंको को अपने ही बॉन्‍डस में निवेश करवाती है; अपने ही प्रोजेक्‍ट और सार्वजनिक उपक्रमों को ऋण दिलवाती है। लोन मेला लगाती है आखिर मे लोन माफ कर देती है। आखिर में लोन माफ कर देती है। इसकी बैंकिंग मोनोपाली ही इसका वोट खरीदने का विजनेस बना जाता है। इस प्रक्रिया में बैंक दिवालिया होते रहते है। चूंकि सारे बैंक सरकारी है तो उनहें नाकाम नहीं होने दिया जा सकता और सरकार के पास टेक्‍स लगाने और नोट छापने के अधिकार है। इसलिए सरकार फिर अपनी ही बैंके खरीदती है । रिकेपीटलाईजेशन से बैंकों से आप बान्‍ड जारी करवा सकते है। जिसकी मदद से  आप अन्‍य कंपनियां जैसे अतिरिक्‍त नगदी बाले सार्वजनिक उपक्रमों को खरीद सकते है। अब मुझे बताईयें की क्‍या हमारी माइलों माइंडर बाइंडर से भी ज्‍यादा चतुर पूंजीवादी नहीं है? यदि उसका इकोनामिक कैच-22 था तो भारत सरकार का कैच-23 होगा।

         आपकों यह पूछने की इच्‍छा हो सकती है कि कैच-22 का मेरा यह व्‍यंग बैंकों को उबारने के लिए नवीनतम कार्यक्रम की मेरी सराहना से कैसे मिलता है। यह अच्‍छा कार्यक्रम है क्‍योंकि मौजूदा परिस्थितियों में यहीं संभव था यदि आप डॉक्‍टर है और अस्‍थमा के भीषण के अटैक में आपके रोगी का दम घुट रहा हो तो पीर में साईड अफेक्‍ट की परवाह किए बिना स्‍टेराईड पंप करने के अलावा आप क्‍या करेंगे? 70 फीसदी बैंकिंग सरकारी हो, वे दिवालिया होने के करीब हो तो आप क्‍या करेंगे? फंड खड़ा करने के लिए बान्‍ड जारी करने का आईडिया चतुराई भरा है। लेकिन अब नगदी से मालामाल अन्‍य सार्वजनिक उपक्रम, जिनमें ज्‍यादातर ऊर्जा की मोनोपाली है को यह बान्‍ड खरीदने को कहा जायेगा यह विचलित करने वाली बात है।  हम इतने भी नासमझ नहीं है कि उनसे इंदिरा गांधी की सबसे खराब विरासत, बैंको के राष्‍ट्रीयकरण को उलटने की मांग करे।

45 WPM Hindi Dictation for High Court, SSC, CRPF, Railways, LDC Exam Post 255 With Legal Matter

45 WPM Hindi Dictation for High Court, SSC, CRPF, Railways, LDC Exam Post 255 With Legal Matter


पार्ट 255

कुल शब्‍द 435 समय 9 मिनिट 45 सेंकेंड


45 WPM Hindi Dictation for High Court, SSC, CRPF, Railways, LDC Exam Post 255 With Legal Matter


इस धारा का उद्देश्‍य दोषी व्‍यक्ति द्वारा अपराध के शिकार व्‍यक्ति को प्रतिकर देने तथा अभियोजन में उपगत व्‍ययों को चुकाने तथा उनकी  भ्रर्त्‍सना करने के लिए समुचित व्‍यवस्‍था करना है। दण्‍ड न्‍यायालय का कार्य अपराधी को दंडदेना और व्‍यवहार विषयक सिविल न्‍यायालय का कार्य, दोषकर्ता द्वारा विक्षुब्‍ध पक्षकार को कारित की गई क्षति अथवा हानि के लिए प्रतिकर दिलवाना है। तथापि यदि इन दोनों प्रक्रियाओं को सम्मिलित किया जा सकता है और उसके फलस्‍वरूप दाण्डिक और व्‍यवहार संबंधी आदेशिकाएं प्रभावित भी नहीं होती,  तो ऐसा करना उचित और इष्‍टकर होगा कयोंकि इससे दो भिन्‍य न्‍यायालयों में उपचार प्राप्‍त करने में समय और धन दोनों की बचत होगी। धारा 357 इसी लक्ष्‍य को लेकर आगे बढ़ती है।
         इसे धारा के अधीन प्रतिकर का आदेश दिया जा सकता है चाहे भले ही अपराध जुर्माने से दंडनीय हो और जुर्माना दिनांक 23/03/2007 से वास्‍तविक रूप से लगाया गया हो। परंतु ऐसे प्रतिकर का आदेश तभी दिया जा सकता है जब अभियुक्‍त को दोषसिद्धी प्रदान की गई हो। उसके विरूद्ध दंडादेश पारित किया गया हो। प्रतिकर किसी भी हानि या क्षति के लिए देया हो सकता है, चाहे वह शारीरिक हो या अर्थ संबंधी प्रतिकर हो। न्‍यायालय को इस निमि‍त्‍य क्षति की प्रकृति, क्षति की प्रणिति की रीति को अभियुक्‍त भुगतान क्षमता और अन्‍य प्रासंगिक हेतुको पर ध्‍यान देना चाहिए। गिरधारी लाल विरूद्ध महाराष्‍ट्र राज्‍य के मुकदमें में अभिमत व्‍ययक्‍त किया गया था कि धारा 357 के अधीन प्रतिकर देने के आदेश के लिए जुर्माने के मूल दंडादेश की प्रणीति एक अपरिहार्य शर्त है। जुर्माने के दंड की प्रणीति के बिना यदि न्‍यायालय राज्‍य के पक्ष में अभियुक्‍त यानी अभियोजन के उपगत व्‍ययों को चुकाने के लिए 3000 रूपए के भुगतान का निर्देश देती है और विशेषकर तब जब अभियुक्‍त्‍ को परीवीक्षा पर किया गया हो तो उसे औचित्‍य पूर्ण नहीं माना जा सकता है।

         इसी प्रकार धारा 357(1) के अधीन प्रतिकर के भुगतान का निर्देश  जब अभियता को जुर्माने से दण्डित किया हो, अथवा इस प्रकार जिसका एक भाग भी दण्डित हो प्रतिकर की धनराशि को किसी वसूली गई जुर्माने की राशि से देने का निर्देश दिया जाना चाहिए। इस प्रकार प्रतिकर की राशि को कभी भी जुर्माने धन राशि से अधिक नहीं होना चाहिए। जुर्माने की राशि का परिणाम पुन: उस पुर्नसीमा पर निर्भर करती है जो कि अपराध विशेष के लिए दंडादिष्‍ट की जा सकती है और उस पर विस्‍तार तक निर्भर करती है। जिस तक अत्‍यंत उदारता के साथ और उपर्युक्‍त निर्धनों के अधीन न रहते हुए भी की जा सकती है। परंतु यह केवल तभी लागू होता है जब जुर्माने के दंडादेश की प्रणीति नहीं की गई हो।

70 WPM

चेयरमेन साहब मैं आपसे कहना चाहता हूँ कि हम लोग देख रहे है कि गरीबी सबके लिए नहीं है कुछ लोग तो देश में इस तरह से पनप रहे है‍ कि उनकी संपत...