Monday, 12 March 2018

Post - 151


471
समय 10 मिनिट

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 यदि पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी को, इत्तिला प्राप्‍त होने पर या अन्‍यथा, यह संदेह करने का कारण है कि ऐसा अपराध किया गया है जिसका अन्‍वेषण करने के लिए धारा 156 के अधीन वह सशक्‍त है तो वह उस अपराध की रिपोर्ट उस मजिस्‍ट्रेट को तत्‍काल भेजेगा जो ऐसे अपराध का पुलिस रिपोर्ट पर संज्ञान करने के लिए सशक्‍त है और मामले के तथ्‍यों और परिस्थितियों का अन्‍वेषण करने के लिए, और यदि आवश्‍यक हो तो अपराधी का पता करने के लिए उसकी गिरफ्तारी के उपाय करने के‍ लिए उस स्‍थान पर या तो स्‍वयं जायेगा या अपने अधीनस्‍थ अधिकारियो में से एक को भेजेगा जो ऐसी पंक्ति से निम्‍नतर पंक्ति ना होगा जिसे राज्‍य सरकार साधारण या विशेष आदेश द्वारा इस निमित्‍व विहित करे।


         जब ऐसे अपराध के लिए किए जाने की कोई इत्तिला किसी व्‍यक्ति के विरूद्ध उसका नाम देकर की गई है और मामला गंभीर प्रकार का नहीं है तब यह आवश्‍यक ना होगा कि पुलिस थाने का भारसाधक अधिकारी उस स्‍थान पर अन्‍वेषण करने के लिए स्‍वयं जाये या अधीनस्‍थ अधिकारी को भेजे।


         यदि पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी को यह प्रतीत होता है कि अन्‍वेषण करने के लिए पर्याप्‍त आधार नहीं है तो वह उस मामले का अन्‍वेषण ना करेगा।


         उपधारा 1 के परन्‍तुक के खण्‍ड क और खण्‍ड ख में वर्णित दशाओं में से प्रत्‍येक दशा में पुलिस थाने का भारसाधक अधिकारी अपनी रिपोर्ट में उस उपधारा की अपेक्षाओं का पूर्णत: अुनपालन ना करने के अपने कारणों का कथन करेगा। और उक्‍त परन्‍तुक के खण्‍ड में वर्णित दशा में ऐसा अधिकारी इत्तिला देने वाले को यदि कोई हो तो ऐसी रीति से जो राज्‍य सरकार द्वारा विहित की जाये तत्‍काल इस बात की सूचना दे देगा कि वह उस मामले में अन्‍वेषण ना तो करेगा और ना करायेगा।


         रिपोर्ट कैसे दी जायेगी – धारा 157 के अधीन मजिस्‍ट्रेट को भेजी जाने वाली प्रत्‍येक रिपोर्टख, यदि राज्‍य सरकार यदि ऐसा निर्देश देती है, तो पुलिस के ऐसे वरिष्‍ठ अधिकारी के माध्‍यम से दी जायेगी, जिसे राज्‍य सरकार साधारण या विशेष आदेश द्वारा इस निमित्‍त नियत करे।
         ऐसा वरिष्‍ठ अधिकारी पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी को ऐसे अनुदेश दे सकता है जो वह ठीक समझे और उस रिपोर्ट पर उन अनुदेशों को अभिलिखित करने के पश्‍चात उसे अभिलंब मजिस्‍ट्रेट के पास भेज देगा।


         अन्‍वेषण या प्रारंभिक जांच करने की शक्ति – ऐसा मजिस्‍ट्रेट ऐसी रिपोर्ट प्राप्‍त होने पर अन्‍वेषण के लिए आदेश दे सकता है, या यदि वह ठीक समझे तो वह इस संहिता में उपबंधित रीति से मामले की प्रांरभिक जांच करने के लिए या उसको अन्‍यथा निपटाने के लिए तुरंत कार्यवाही कर सकता है, या अपने अधीनस्‍थ किसी मजिस्‍ट्रेट को कार्यवाही करने के लिए प्रतिनियुक्‍त कर सकता है।


कोई पुलिस अधिकारी, जो इस अध्‍याय के अधीन अन्‍वेषण कर रहा है अपने थाने की या किसी पास के थाने की सीमाओं के अंदर

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529
समय 11 मिनिट 40 सेकेंड

न्‍यायालय को यह पता चलता है कि आवेदन अभियुक्‍त द्वारा स्‍वेच्‍छा से फाइल नहीं किया गया है या उसे किसी न्‍यायालय द्वारा किसी मामले में जिसमें उस पर अपराध पर आरोप था, सिद्धदोष ठहराया गया है तो वह इस संहिता के उपबंधों के अनुसार उस प्रकम से जहां उपधारा 1 के अधीन ऐसा आवेदन फाइल किया गया है, आगे कार्यवाही करेगा। धारा 256 ख की उपधारा 4 कें खण्‍ड क के अधीन पार‍स्‍परिक संतोषप्रद निपटारे के लिए न्‍यायालय निम्‍नलिखित प्रक्रिया अपनायेगा अर्थात पुलिस रिपोर्ट पर संस्‍थित किसी मामले में न्‍यायालय लोक अभियोजक, पुलिस अधिकारी, जिसने मामले का अन्‍वेषण किया है, अभियुक्‍त और मामले में पीडि़त व्‍यक्ति को उस मामले का संतोषप्रद निपटारा करने के लिए बैठक में भाग लेने के लिए सूचना जारी करेगा। 


परंतु मामले के संतोषप्रद निपटारे की ऐसी संपूर्ण प्रक्रिया के दौरान न्‍यायालय का यह कर्तव्‍य होगा कि वह सुनिश्चित करे कि सारी प्रक्रिया बैठक में भाग लेने वाले पक्षकारों द्वारा स्‍वेच्‍छा से पूर्ण की गई है। परंतु यह और कि अभियुक्‍त, ऐसी वांछा करे तो मामले में लगाए गए अपने अभिवक्‍ता यदि कोई हो, के साथ इस बैठक में भाग ले सकेगा। पुलिस रिपोर्ट से अन्‍यथा संस्‍थित मामले में न्‍यायालय अभियुक्‍त और उस मामले में पीडि़त व्‍यक्ति को मामले के संतोषप्रद निपटारे के लिए की जाने वाली बैठक में भाग लेने के लिए सूचना जारी करेगा। परंतु न्‍यायालय का यह कर्तव्‍य होगा कि वह मामले का संतोषप्रद निपटारा करने की संपूर्ण प्रक्रिया के दौरान यह सुनिश्चित करे कि उसे बैठक में भाग लेने वाले पक्षकारों द्वारा स्‍वेच्‍छा से पूरा किया गया है परंतु यह और कि यदि यथा स्थिति मामले में पीडि़त व्‍यक्ति या अभियुक्‍त, ऐसी वांछा करे तो वह उस मामले में लगाये गये अपने अभिव्‍यक्‍ता के साथ उस बैठक में भाग ले सकेगा। जहां धारा 265 क के अधीन बैठक में मामले का कोई संतोषप्रद निपटारा तैयार किया गया है वहां न्‍यायालय ऐसे निपटारे की रिपोर्ट तैयार करेगा जिस पर न्‍यायालय के पीठासीन अधिकारी उन अन्‍य सभी व्‍यक्तियों कें हस्‍ताक्षर होगे जिन्‍होने बैठक में भाग लिया था। 


जहां धारा 265 क के अधीन बैठक में मामले का कोई संतोषप्रद निपटारा तैयार किया गया है, वहां न्‍यायालय ऐसे निपटारे की रिपोर्ट तैयार करेगा जिसपर न्‍यायालय के पीठासीन अधिकारी और अन्‍य सभी व्‍यक्तियों कें हस्‍ताक्षर होगें जिन्‍होंने बैठक में भाग लिया था और यदि ऐसा कोई निपटारा तैयार नहीं किया जा सका है तो न्‍यायालय ऐसा संपेक्षण लेखबद्ध करेगा और इस संहिता के उपबंधों के अनुसार उस प्रकम से आगे की कार्यवाही करेगा, जहां से  उस मामले में धारा 265 ख की उपधारा 1 के अधीन आवेदन फाइल किया गया है। जहां धारा 265 घ के अधीन मामले का कोई संतोषप्रद निपटारा तैयार किया गया है वहां न्‍यायालय मामले का निपटारा निम्‍नलिखित रीति से करेगा अर्थात न्‍यायालय पीडि़त व्‍यक्ति को धारा 265 घ के अधीन निपटारे के अनुसार प्रतिकर देगा और दण्‍ड की मात्रा अभियुक्‍त को सदाचार की परीवीक्षा पर या धारा 360 के अधीन भ्रर्त्‍सना के प्रश्‍चात छोड़ने अथवा अपराधी परीवीक्षा अधिनियम 1958 या तत्‍समय प्रवत्‍त किसी अन्‍य विधि के उपबंधों के अधीन अभियुक्‍त के संबंध में कार्यवाही करने के विषय में पक्षकारों की सुनवाही करेगा और अभियुक्‍त पर दण्‍ड अधिरोपित करने के लिए पश्‍चावर्ती खण्‍डों में विनिर्दिष्‍ट

Post - 148


477
समय 10 मिनिट


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प्रतिदावा को मात्र धन के बाद में स्‍वीकार किया जा सकता है, कब्‍जा एवं स्‍वामित्‍व के बाद में नहीं। इसी सिदांत को जसंबत सिंह बनाम दर्शन कुमार एआईआर 1983 पटना के वाद में विरोधी दृष्टिकोण और अपनाया और  अभिधारित किया कि प्रतिदावा धन-संबंधी वाद तक ही सीमित नहीं है मुजरा और प्रतिदावा मे भिन्‍यता है। मुजरा वादी के विरूद्ध प्रतिदावा है किंतु प्रतिवादी जब प्रतिदावा पेश करता है तो वह प्रतिवाद होता है।

        यही दृष्टिकोण पंजाब एवं हरियाण उच्‍च न्‍यायालय ने सुमन कुमार बनाम सेंट थॉमस स्‍कूल एआईआर 1988 पंजाब एवं हरियाणा 38 के वाद में अपनाया। अभिनिर्णीत किया कि प्रतिवादी किसी भी प्रकार के वाद में प्रतिदावा प्रस्‍तुत कर सकता है। आवश्‍यक नहीं कि ऐसा वाद धन संबंधी हो।

        किंतु उड़ीसा उच्‍च न्‍यायालय ने इस मत का समर्थन किया। मेसर्स रामसेवक बनाम सरफुद्दीन एआईआर 1991, उड्रीसा 51 के वाद में अभिधारित किया कि प्रतिदावा उन वादों में संभव है जो धन-संबंधी नहीं है।

        बंबई उच्‍च न्‍यायालय ने एमएफ कटारिया बनाम एचएफ कटारिया एआईआर 1994 बाम्‍बे 198 के वाद में इस मत को स्‍वीकार किया कि प्रतिदावा आदेश 8 नियम 6-क के अंतर्गत्‍ धन संबंधी वाद तक ही सीमित नहीं है।
        प्रतिवाद पत्र में यह अभिवाक् नहीं किया गया था कि प्रतिवादी बीमार यूनिट था और वादी कोई धनराशि वसूल नहीं कर सकता था। संसोधना प्रार्थना पत्र द्वारा यह अभिवाकृ किया जाना था कि प्रतिवादी बीमारा यूनिट था और बीमारी के दौरान, के समय का ब्‍याज नहीं लगाया जा सकता।

        यह ऐसा अभिवाक् नहीं है जिससे वादी के वाद पर कोई प्रभाव डाले। ना तो साक्ष्‍य ही पेश किए गए थे ना ही निश्चित किए गये थे। प्रतिवादी बीमार यूनिट था अथवा नहीं तभी अनिश्चित किया जा सकता है जब ऐसा अभिवाक् करने की अनुमति प्रदान कर दी जाती है। इस स्‍तर पर यदि  अभिवाक् करने की अनुमति प्रदान कर दी जाती है तो वादी के वाद पर कूप्रभाव नहीं पढ़ेगा। (मेसर्स जे एस टिन्‍स) फेब्रीकेशन बनाम यूको बैंक।


 आदेश 8 नियम 1 का उपनियम 1, न्‍यायालय को शक्ति प्रदान करता है कि वह प्रतिवादी को जबाव दावा दाखिल करने के लिए न्‍यायोचित समय प्रदान करे। प्रत्‍येक मामले के तथ्‍यों एवं परिस्थितियों कें आधार पर न्‍यायालय जबाव दावा दायर करने का समय प्रदान करता है, किंतु प्रतिवादी अधिकार के रूप में जबाव दावा दाखिल करने के कई अवसर की मांग नहीं कर सकता।

        अस्‍थाई निषेधाज्ञा आदेश पारित करने के पूर्व किसी भी समय न्‍यायालय प्रतिवादी से जबाव दावा दाखिल करने के हेतु कह सकता है। ऐसे मामले में वादी को अधिकार प्राप्‍त हो जाता है कि अस्‍थाई निषेधाज्ञा प्राप्‍त करने हेतु प्रति जबाव दावा प्रस्‍तुत करे। यह अधिकार उसे आदेश 8 नियम 9 के तहत प्राप्‍त होता है। यद्यपि आदेश 8 नियम 9 के अंतर्गत्‍ प्रार्थना नहीं की जा सकती किंतु धारा 151 कें अंतर्गत प्राप्‍त शक्ति का प्रयोग करते हुए प्रार्थना पत्र न्‍यायालय द्वारा स्‍वीकार किया जा सकता है।
       

Post - 147


460
समय 10 मिनिट

विचारज न्‍यायालय ने आवेदिका के द्वारा प्रस्‍तुत साक्ष्‍य के विपरीत  निष्‍कर्ष निकालते हुए आवेदिका का आवे‍दन निरस्‍त करने में त्रुटि की है। फलत: यह निगरानी स्‍वीकार कर आलोच्‍य आदेश अपास्‍थ करने की प्रार्थना की गई।

अभियोजन का प्रकरण संक्षेप में यह है कि दिनांक 3 अगसत 2011 को अभियुक्‍त सूरज सींग की‍ पत्नि को आग से जल जाने के कारण इलाज हेतु जिला अस्‍पताल में लाया गया जिसका पुलिस सहायता केन्‍द्र द्वारा, जिला अस्‍पताल में दिया गया, जिस पर से उसका उपचार प्रारंभ किया गया। उपचार के दौरान दिनांक 4 अगस्‍त 2011 के सुबह: के चार बजे उसकी मृत्‍यु हो गई जिसकी सूचना चिकित्‍सक द्वारा पुलिस सहायता केन्‍द्र जिला अस्‍पताल को भेजी गई, जिस पर जीरो मार्ग कायम कर प्रकरण जांच में लिया गया तथा साक्षियों को सूचना देकर मृतिका के शव का नक्‍शा पंचनामा बनाया गया तथा उसके शब को शव परीक्षण हेतु आवेदन भरकर जिला अस्‍पताल भेजा गया, जिस पर से मृतिका के शव का शव परीक्षण दिनांक 4 अगस्‍त 2011 को किया जाकर शव परीक्षण रिपोर्ट प्रदान की गई। तत्‍पश्‍चात उक्‍त मर्ग की सूचना थाना को भेजी गई। जिस पर से आकस्‍मिक मृत्‍यु की सूचना थाना में दिनांक 6 अगस्‍त 2011 को कॉयम कर प्रकरण जॉच में लिया गया।


 प्रकरण जॉच में घटना स्‍थल का नक्‍शा मौका बनाया गया व घटना स्‍थल से एक प्‍लास्टिक की पांच लीटर की बॉल्‍टी व माचिस की डिब्‍बी व एक जला हुआ कपड़े का टुकड़ा जप्‍त कर जप्‍तीपत्र बनाया गया। साक्षी के साक्ष्‍य का मूल्‍यांकन करते समय दृष्टिकोण यह होना चाहिए कि क्‍या समग्र साक्षी का साक्ष्‍य एक सच्‍ची श्रृख्‍ंला प्रतीत होता है। 


जब एक बार यह धारणा बना ली जाये तो निसंदेह न्‍यायालय के लिए यह आवश्‍यक है कि संपूर्ण साक्ष्‍य में इंगित न्‍यूनताओं, कमिओं और दोषों को ध्‍यान में रखते हुए साक्ष्‍य की समीक्षा की जाये और यह पता लगाने के लिए उनका मूल्‍यांकन किया जावे कि क्‍या वह साक्षी द्वारा दिए गए साक्ष्‍य के सामान्‍य प्रभाव के प्रतिकूल है और क्‍या साक्ष्‍य का पूर्णत: मूल्‍यांकन अस्थिर हो जाता है जो उसे अविश्‍वनीय बना देता है। 


छुटपूट बातों पर छोटी छोटी न्‍यूनताएं जो मामले की जड़ तक नहीं जाती है, साक्ष्‍य से यंत्र तंत्र संदर्भ से तोड़ फोड़ पर वाक्‍य निकालकर अति तकनीकि दृष्टिकोण अन्‍वेषण अधिकारी द्वारा की गई किसी तकनीकि गलती को महत्‍वदेना जो मामले की जड़ तक नहीं जाती है। साधारणत: सम्‍पूर्ण साक्ष्‍य को अस्‍वीकार करने की इजाजत नहीं देगी। यदि वह न्‍यायालय जिसके समक्ष साक्षी साक्ष्‍य देता है। साक्षी द्वारा दिए गए साक्ष्‍य के सामान्‍य प्रभाव के बारे में राय बना लेने का अवसर था तो अपील न्‍यायालय को जिसे यह सुविधा प्राप्‍त नहीं थी, विचारण न्‍यायालय द्वारा साक्ष्‍य के मूल्‍यांकन को सम्‍यक महत्‍व देना होगा और जब तक बहुत वजनदार और प्रभावशाली कारण ना हो।

Post - 146


420
समय 10 मिनिट

पुनरीक्षणकर्तागण की ओर से प्रस्‍तुत आपराधिक पुनरीक्षण याचिका द्वारा मुख्‍यत: आधार व तर्क लिए है कि फरियादी द्वारा उसे सीने व बायीं पैर में चोर पहुंचाने के कारण अस्थिभंग होना बताया गया। आरक्षी केन्‍द्र ने फरियादी से साठ गांठ कर उक्‍त पुनरीक्षकर्तागण के विरूद्ध अपराध पंजीबद्ध किया गया है। अत: आरोपी के द्वारा सीने में लाथी और आरोपी के द्वारा बांये घुटने में लाथी मारना बताया गया। जबकि मेडिकल बोर्ड द्वारा दोनों ही चोटे होना नहीं पाया गया। ऐसी स्थिति में प्रथमदृष्‍टयां आरोपी के विरूद्ध धारा 323, 504 भारतीय दण्‍ड संहिता के तहत आरोप के तथ्‍य भी गठित नहीं होते है। 


विद्यवान विचारण न्‍यायालय ने उक्‍त कथन की ओर ध्‍यान नहीं देते हुए पुनरीक्षकर्तागण के विरूद्ध धारा 323, अथवा 323 सहपठित धारा 34 एवं धारा 504 भारतीय दण्‍ड संहिता के तहत आरोप विरचित करने में गंभीर भूल की है। विचारण न्‍यायालय द्वारा घोषित निर्णय दिनांक 8 जनवरी 2016 के परिशीलन से भी विदित है कि वादी का वाद निर्णय की कंडिका 12 के अनुसार खारिज किया गया है तथा इस न्‍यायालय द्वारा नियमित व्‍यवहार अपील में घोषित निर्णय की कंडिका  02 में भी वादी का वाद निरस्‍त किए जाने का उल्‍लेख किया गया है। लेकिन निर्णय की कंडिका 18 में लिपीकीय त्रुटिवश, वाद आंशिक रूप से स्‍वीकार किया गया है, लेख हो गया है जो लिपीकीय एवं मामूली त्रुटि है जिसे दण्‍ड प्रक्रिया संहिता की धारा 152 में प्रदत्‍त शक्तितयों का अनुसरण करते हुए सुधार कर निर्णय की कंडिका  18 में लिपीकीय त्रुटिवश लेख, वाद आंशिक रूप से स्‍वीकार किया गया है, के स्‍थान पर वाद अस्‍वीकार किया गया है, अभिलिखित किए जाने का आदेश दिया जाता है।


उपरोक्‍तानुसार आवेदन स्‍वीकार किया जाता है। निर्णय की कंडिका 18 में लाल स्‍याही से सुधार किया जाये एवं सुधार आदेश पत्रिका की प्रति निर्णय के साथ कम्‍प्‍यूटर में अपलोड की जावे।


मामला संक्षेप में यह है कि प्रत्‍यर्थी के द्वारा अधीनस्‍थ विचारण न्‍यायालय के समक्ष अपीलार्थी की स्‍वयं को विवाहिता पत्नि बताते हुए अपीलार्थी द्वारा उसका परित्‍याग कर दिए जाने के आधार पर एक आवेदन अंतर्गत धारा 125 दण्‍ड प्रक्रिया संहिता पेश कर अनावेदक से 7000 रूपए प्रतिमाह भरण-पोषण की राशि वाद व्‍यय सहित दिलाई जाने की प्रार्थना की गई। 


अनावेदक साक्ष्‍य की अंतिम स्थिति पर अपीलार्थी की ओर से एक आवेदन आवेदिका के मेडीकल परीक्षण कराये जाने बावत् पेश किया गया, जिसके जबाव हेतु प्रकरण नियत होता रहा और आदेश दिनांक को अधीनस्‍थ विचारण न्‍यायालय ने अपने आदेश में आवेदिका के अधिवक्‍ता की उपस्थिति तथा अनावेदक की अनुपस्थिति दर्ज करते हुए प्रकरण को निरस्‍त किया है।

Post - 145


430
समय 10 मिनिट

विद्यवान विचारण न्‍यायालय द्वारा माननीय सर्वोच्‍य न्‍यायालय के न्‍याय दृष्‍टांत में अपीलार्थी के विरूद्ध न्‍याय दृष्‍टांत का उचित रूप से संदर्भ लेते हुए उभय पक्ष के मध्‍य व्‍यवहार प्रकृति का विवाद होना पाया है। उक्‍त आदेश विधि सम्‍मत, औचित्‍य पूर्ण तथ्‍यों कें अनुरूप पारित किया गया है, जिसमें हस्‍तक्षेप किए जाने का कोई आधार दर्शित नहीं होता है, अत: विद्यवान विचारण न्‍यायालय का आदेश दिनांक 21 अप्रैल 2015 की पुष्‍टि की जाती है तथा पुनरीक्षकर्ता की ओर से प्रस्‍तुत पुनरीक्षण याचिका प्रमाण के अभाव में निरस्‍त की जाती है। 


अभियुक्‍त के विरूद्ध धारा 7 एवं 13 सहपठित धारा 13 भ्रष्‍टाचार निवारण अधिनियम 1988 के अंतर्गत आरोप है कि उसने दिनांक 30 दिसम्‍बर 2013 के पूर्व से नायब तहसीलदार न्‍यायालय में सहायक ग्रेड तीन जो कि लोक सेवक का पद है, पर पदस्‍थ रहते हुए प्रार्थी व अन्‍य के नाम से खरीदी गई कृषि भूमि के नामांतरण कराने के एवज में अपनी पद्धीय कर्तव्‍य के दौरान वैध पारिश्रमिक से भिन्‍य अवैध पारितोषण के रूप में तीन हजार रूपए की मांग की एवं दिनांक 30 जनवरी 2013 को प्रार्थी एवं अभियोगी से वैध पारिश्रमिक से भिन्‍न अवैध पारितोषण की राशि रूपए 2000 प्राप्‍त किए तथा लोकसेवक के पद पर पदस्‍थ रहते हुए भ्रष्‍ट या अवैध साधनों से अपने पद का दुर्पयोग करते हुए दिनांक 30 जनवरी 2013 को अभियोगी से 2000 रूपए स्‍वयं  के लिए वैध पारिश्रमिक से भिनन राशि प्राप्‍त कर आपराधिक अवचार का अपराध कारित किया।


आवेदक की ओर से यह तर्क किया गया है कि यह उसका प्रथम नियमित जमानत आवेदन पत्र है इसके अतिरिक्‍त अन्‍य कोई आवेदन माननीय उच्‍च न्‍यायालय खण्‍डपीठ ग्‍वालियर के समक्ष ना तो लंबित है और ना ही निराकृत किया गया है वह दिनांक 4 जनवरी 2017 से न्‍यायिक निरोध में है वह निर्दोष है उसे प्रकरण में मिथ्‍या आलिप्‍त किया गया है। 

प्रकरण के निराकरण में समय लगने की संभावना है। अभियुक्‍त शिवपुरी जिले का स्‍थाई निवासी है। उसके भागने एवं । फरार होने की कोई संभावना नहीं है। अभियुक्‍त्‍ अ‍न्‍वेषण में पूर्ण सहयोग करेगा तथा अभियोजन साक्षियों को प्रभावित भी नहीं करेगा वह जमानत की शर्तो का पूरी तरह से पालन करेगा।  अभियुक्‍त्‍ ने अपनी आवेदन के समर्थन में अपनेभाई सुनील सींग का सपथ पत्र प्रस्‍तुत किया है।


किसी प्रकरण में यदि कोई साक्ष्‍य अपीलार्थी की ओर से पेश किया गया है और उस साक्ष्‍य पर किसी भी अभियोजन साक्षी के द्वारा कोई विरोध नहीं करता है तो ऐसी स्थिति में न्‍यायाधीश उस मामले में गंभीरता से विचार विमर्श करेगा और तब अपने अंतिम निर्णय को अभिलिखत करेगा।


विद्यवान विचारण न्‍यायालय द्वारा माननीय सर्वोच्‍य न्‍यायालय के

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457
समय 10 मिनिट

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प्रकरण मे अभियुक्‍त के विरूद्ध धारा 106 भारतीय दण्‍ड संहिता के अधीन यह आरोप है कि उसने दिनांक 16 फरवरी 2016 को शाम 8 बजे के पूर्व से मेघा को शारीरिक व मानसिक रूप से प्रताणित किया तथा उसके साथ मारपीट कर उसे आत्‍महत्‍या करने के लिए दुष्‍प्रेरित किया जिसके परिणाम स्‍वरूप मेघा ने उक्‍त दिनांक को 7 से 8 बजे के लगभग गॉव के बीच रास्‍ते में पेंड के सामने आकर आत्‍महत्‍या कर ली।

प्रकरण में आरोपी के विरूद्ध भारतीय दण्‍ड विधान की धारा 498, 506 एवं दहेज प्रतिशेध अधिनियम 1961 के अंतर्गत अपराध विरचित कर विचारण प्रारंभ किया गया। प्रकरण में अभियोजन द्वारा साक्ष्‍य समान घोषित की गई तथा प्रकरण मे अभिलेख पर आई हुई साक्ष्‍य के आधार पर आरोपी के विरूद्ध दण्‍ड प्रक्रिया संहिता की धारा 313 के अंतर्गत कथन में उसने बताया कि वह वेकसूर है तथा उसे झूठा फंसाया गया है आरोपी की ओर से बचाव साक्ष्‍य भी अभिलेख पर प्रस्‍तुत की गई है। प्रकरण में अभिलेख पर आई साक्ष्‍य आपस में सशख्‍त एवं विचारणीय है। अत: ऐसी स्थिति मे साक्ष्‍य की पुर्नरावृत्ति के दोष निवारानार्थ उक्‍त प्रश्‍नों का निवारण किया जा रहा है।


         उक्‍त्‍ प्रकरण में इस प्रकार अवलेख पर जो साक्ष्‍य आई है उसके अवलोकन से यह स्‍पष्‍ट है कि मामले की फरियादिया ने अपनी कथन में स्‍पष्‍ट रूप से बताया है आरोपी द्वारा विवाह के दो वर्ष पश्‍चात से दहेज की मांग की जा जाने लगी। उक्‍त साक्षी की साक्ष्‍य से यह स्‍पष्‍ट है कि दिनांक 28.02.2013 को आरोपी द्वारा न केवल दहेज की मांग की गई बल्कि फरियादिया के साथ मारपीट की गई और जान  से मारने की धमकी दी गई। उक्‍त साक्षी के कथनों का अनुसमर्थन अभियोजन साक्षी 02, अभियोजन साक्षी 03 की साक्ष्‍य से भी हो रहा है।


         भारतीय दण्‍ड संहिता की धारा 292, 293 और साथ में दण्‍ड प्रक्रिया संहिता की धारा 501 या 502 की उपधारा 3 के अधीन दोषसिद्ध पर न्‍यायालय उन सब प्रतियों कें, जिसके बारे में दोषसिद्धी हुई है और जो न्‍यायालय की अभिरक्षा में है, सिद्धदोष व्‍यक्ति के कब्‍जें में या सकती है नष्‍ट किए जाने के लिए आदेश दे सकता है। ऐसी स्थिति में कोई भी अभियुक्‍त माननीय न्‍यायालय के आदेश को मान्‍य करेगा और यदि वह ऐसा नहीं करता है तो वह कठोर दण्‍ड के कारावास से दण्‍डनीय होगा।


         उक्‍त प्रकरण में धारा 113 के अधीन जारी किए गए प्रत्‍येक समन या वारंट के साथ धारा 111 कें अधीन दिए गए आदेश की प्रति होगी और उस समन या वारंट की तामील या निष्‍पादन करने वाला अधिकारी वह प्रति उस व्‍यक्ति को परिदत्‍त करेगा जिस पर उसकी तामील की गई है या जो उसके अधीन पकड़ा गया है।

अपीलार्थीगण की ओर से यह तर्क किया गया है कि उक्‍त मामले में सभी साक्षी हितबद्ध साक्षी है।

70 WPM

चेयरमेन साहब मैं आपसे कहना चाहता हूँ कि हम लोग देख रहे है कि गरीबी सबके लिए नहीं है कुछ लोग तो देश में इस तरह से पनप रहे है‍ कि उनकी संपत...