Monday, 23 April 2018

Hindi Dictation


उक्‍त प्रकरण में प्रस्‍तुत अभियोजन साक्ष्‍य से यह प्रमाणित नहीं है कि आरोपी ने दिनांक 04 जनवरी 2016 को शाम करीबन 6 बजे  शिव मंदिर के पास 18 वर्ष से कम उर्म की फरियादी द्वारा स्‍पष्‍ट अनिक्षा उपदर्शित किए जाने के बावजूद, बारम्‍बार पीछा कर संपर्क करने का भरसक प्रयत्‍न किया तथा लैंगिक आशय से बार बार पीछा कर लैंगिक उत्‍पीड़न किया। अत: आरोपी को धारा 354 भारतीय दण्‍ड विधान एवं धारा 12 लैंगिक अपराधों से पालकों का संरक्षण अधिनियम 2012 के आरोप से दोषमुक्‍त किया जाता है। आरोपी के जमानत मुचलके छह माह पश्‍चात भारमुक्‍त समझे जावे।
            अभिलेख के अवलोकन से पता चलता है कि अ‍धीनस्‍थ न्‍यायालय द्वारा प्रतिवादी एवं अपीलार्थी पक्ष को साक्ष्‍य देने के लिए चार-पांच अवसर प्रदान किए गए है परंतु साक्ष्‍य तिथियों में समय अंतराल काफी कम रहा है उक्‍त दिनांक को वादी साक्ष्‍य समाप्‍त करने के पश्‍चात उक्‍त दिनांक को प्रतिवादी साक्ष्‍य देने के लिए नियत की गई। यद्धपि अधीनस्‍थ न्‍यायालय ने अपीलार्थी पक्ष को साक्ष्‍य देने के लिए अवसर प्रदान किए है।
            प्रेम में प्रतिदान की तनिक भी गुजांइश नहीं है। वे के आगे मुक्ति भी विफल है। प्रेम, प्रेम के लिए होना चाहिए। यह भाव भी नहीं होना चाहिए कि वह प्रेम कर रहा है। प्रेम में केवल देना ही देना है, लेना कुछ भी नहीं। प्रेम को विजारत ना बनने दे। प्रार्थना का असली अर्थ परमात्‍मा से किसी प्रकार की याचना नहीं है अहंकार वह वाधक तत्‍व है जो प्रेम को मनुष्‍य के भीतर ही उतरने नहीं देता, परमात्‍मा ही प्रेम है, लेकिन उसे निश्‍छल प्रेम ही चाहिए। लोग प्रेमवश जीवनदायनी किरणे विसर्जित करता है मेघ भेद-भाव के वगैर सभी के खेतों में बरसता है। नदी प्‍यास मिटाने के लिए निरंतर बहती है। बृक्ष फल जुटाने के लिए झुक जाते है। हवा जीवन देने के लिए बहती ही रहती है।  इस प्रेम के बदले वे हमसे कुछ नहीं चाहते, परंतु हम लोग भ्रांत सुख की खोज में नि:ममता से इन सब का दोहन करते रहते है। इस संकट से बचने के लिए हमे अपने को सबके साथ प्रेम के बंधन में बंध कर चलना होगा। हां अन्‍यथा हमारा ही अस्तित्‍व ही खतरे में पड़ जायेगा। यहीं प्रेम का सार है और इसे किसी भी तरह आत्‍मसात करना होगा।
            जहां तक मामले में वाहन चालक की लापरवाही का प्रश्‍न है तो इसके लिए आवश्‍यक नहीं है कि मामले की दुर्घटना को कठोरता से साबित किया जावे। इस संबंध में न्‍यायदृष्‍टांत विमला देवी एवं अन्‍य के विरूद्ध के मामले में एवं माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा यह निर्धारित किया गया है कि इस तरह के प्रकरण में दुर्घटना को कठोरता से साबित किया जाना आवश्‍यक नहीं होता है। और ऐसे प्रकरण में तथ्‍य को संदेह से परे प्रमाणित करने का सिद्धांत लागू नहीं होता है।

Wednesday, 18 April 2018

hindi 2


इस प्रकरण में गाडी के चालक ने अचानक सड़के बीच मे ब्रेक लगा दिए पीछे से आ रही कार की ट्रक से टक्‍कर हो गई तथा कार में बैठे चार व्‍यक्तियों की मौके पर ही मृत्‍यु हो गई। उक्‍त प्रकरण में चालक का बचाव लिया गया कि कार के चालक ने सुरक्षित दूरी नहीं रखी थी अधिकरण ने ट्रक चालक को दुर्घटना के लिए जिम्‍मेदार माना जबकि माननीय उच्‍च न्‍यायालय ने अधिकरण के आदेश को संशोधित किया तथा दोनों वाहन चालकों को दुर्घटना के लिए बराबर का उत्‍रदायी माना उपरोक्‍त न्‍यायदृष्‍टांत के प्रकाश में बीमा कंपनी की ओर से तर्क किया गया कि इस प्रकरण में भी दुर्घटना में दोनों वाहन चालको की लापरवाही है तथा दुर्घटना मृतक बहादुर सिंह की लापरवाही से भी हुई है तथा बीमा कंपनी के तर्को तथा उपरोक्‍त वर्णित न्‍यायदृष्‍टांतों के प्रकाश में अभिलेख पर आई साक्ष्‍य का बारीकी से परिशीलन किया जाना आवश्‍यक है। विधि का यह भी सुस्‍थापित सिद्धांत है कि इस तरह के आवेदन में आवेदक को अपना पक्ष आपराधिक मामलो की तरह संदेह से परे प्रमाणित नहीं करना होताहै। वास्‍तव में सुख और दुख की अवधारणा ही दोषपूर्ण है। मनुष्‍य कर्मो की पूंजी एकत्र करता चले तो वह सुख और दुख से  उपर उठ जाता है और वह शांत अवस्‍था प्राप्‍त कर लेता है। मनुष्‍य को उसके कर्मो के अनुसार ही फल मिलना है। हर मनुष्‍य को जीवन में सम्‍मान और प्रतिष्‍ठा चाहिए। माना जाता है कि जीवन में परम सुख इसी से मिलता है। धन, सम्‍पदा, कुल, वंश, ज्ञान और पद की प्राप्ति की मनोरथ तो समाज में सम्‍मान पाने का सिद्धांत है। सद्गुणों से प्राप्‍त स्‍थाई रहता है किंतु एेसा मनुष्‍य उस आत्मिक अवस्‍था को प्राप्‍त कर चुका होता  है। जहां मान व अपमान, निंदा और स्‍तुति उसके लिए आवश्‍यक हो जाते है। मान अपने कर्म करते जाने से ही उसे असीम आनंद मिलता है जिन कार्यों से आत्‍मसंतुष्ठि मिले, वे ही सद्कर्म है और सद्गुणों के प्रतीक है और इनसे ही जीवन का बना रहता है मनुष्‍य के पास इस कर्मो को करने के लिए समय ही नहीं है। इस अभाव के कारण ही आज का मनुष्‍य इधर उधर भटक रहा है।
         उक्‍त प्रकरण में जहां से जांच प्रतिवेदन प्राप्‍त हुआ, नमूने को उच्‍च स्‍तर का घोषित किया गया तथा विक्रेता के विरूद्ध खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम 2006 की धारा 26, 31 सहपठित धारा 51 एवं 58 में परिवादपत्र प्रस्‍तुत किया गया। खाद्य सुरक्षा अधिकारी द्वारा अपीलार्थी को खाद्य सुरक्षा मानक अधिनियम 2006 की धारा 26 एवं 31 का उल्‍लंघन पाते हुए कार्यवाही हेतु परिवाद न्‍याय निर्णायक अधिकारी खाद्य सुरक्षा एवं अतिरिक्‍त जिला दण्‍डाधिकारी के समक्ष प्रस्‍तुत किया गया। उक्‍त प्रकरण का अवलोकन करने से यह पाया गया कि परिवादी ने शासन के नियमों की अवहेलना की है जो कि अपराध की श्रेणी में आता है।

hindi dictation


अपीलार्थी द्वारा प्रस्‍तुत अपील का सारांश इस प्रकार है कि अपीलार्थी एवं वादी ने एक व्‍यवहारवाद न्‍यायालय में प्रस्‍तुत किया था। यह बात  उक्‍त दिनांक को वादी की अनुपस्थिति में निरस्‍त हो गया था, जिसे नम्‍बर पर पुन: स्‍थापित करने के लिए वादी ने एक आवेदन पत्र अंतर्गत आदेश 9 नियम 4 सिविल पक्रिया के तहत प्रस्‍तुत किया था, तत्‍पश्‍चात प्रकरण विचारण न्‍यायालय में स्‍थानातरित हुआ। विचारण न्‍यायालय द्वारा आवेदन पत्र यह कहकर निरस्‍त कर दिया कि आवेदन पत्र परिसीमा अधिनियम के अनुच्‍छेद 122 द्वारा निर्धारित अवधि 20 दिन के अंदर प्रस्‍तुत नहीं किया गया। जबकि आवेदन 29 दिन के भीतर ही प्रस्‍तुत किया गया था। विचारण न्‍यायालय का उपरोक्‍त निष्‍कर्ष त्रुटिपूर्ण है अपीलार्थी के पिता का मुख्‍तारनामा है मूल मुख्‍तारनामा गुम हो गया है। मुख्‍तारनामा की फोटोकॉपी आवेदन के साथ प्रस्‍तुत  की गई है। अपीलार्थी ने विचारण न्‍यायालय के समक्ष प्रकरण को पुन: स्‍थापन करने के लिए पर्याप्‍त आधार प्रस्‍तुत किए है। दिनांक 18 फरवरी 2015 को प्रकरण कार्यलय प्रतिवेदन हेतु नियत था, इस कारण विचारण न्‍यायालय को प्रकरण अदम पैरवी में निरस्‍त नहीं करना चाहिए था। अत: अपील स्‍वीकार कर मूल प्रकरण पुन: सथापित किया जाए।
         उभयपक्ष के मध्‍य इस बिंदु पर कोई विवाद नहीं है कि अपीलार्थी एवं वादी का मूल व्‍यवहार प्रकरण क्रमांक दिनांक 18 फरवरी 2015 की वादी की अनुपस्थिति में निरस्‍त किया गया था। इस बिंदु पर भी कोई विवाद नहीं है कि वादी ने अपने मूल प्रकरण को पुन: स्‍थापित करने के लिए आवेदन पत्र अंतर्गत आदेश 9 नियम 4 सिविल प्रक्रिया संहिता दिनांक 19 मार्च 2015 को प्रस्‍तुत किया था। इस बिंदु  पर भी कोई विवाद नहीं है कि व्‍यवहार  प्रकरण को पुर्नस्‍थापित करने के लिए आवेदन मूल व्‍यवहार प्रकरण निरस्‍ती दिनांक से 30 दिन की अवधि के अंदर न्‍यायालय में प्रस्‍तुत करना चाहिए। मूल व्‍यवहार प्रकरण निरस्‍ती दिनांक से पुन: स्‍थापन आवेदन दिनांक के मध्‍य की अवधि को सरसरी तौर पर देखने से  यह स्‍पष्‍ट हो जाता  है कि अपीलार्थी एवं वादी द्वारा व्‍यवहार प्रकरण पुर्नस्‍थापना संबंधी आवेदन पत्र बीस दिन के अंदर प्रस्‍तुत किया गया है। इसके अतिरिक्‍त फरवरी माह 20 दिन से  कम अवधि का होता है। अत: ऐसी स्थिति में स्‍वाभाविक रूप से यह प्रमाणित होता है कि अपीलार्थी एवं वादी द्वारा मूल व्‍यवहार प्रकरण को पुर्नस्‍थापित करने के लिए आवेदन पत्र अंतर्गत आदेश 9 नियम 4 सिविल प्रक्रिया संहिता निर्धारित समयावधि 30 दिन के अंदर प्रस्‍तुत दिया गया था। इस संबंध में विद्यवान विचारण न्‍यायालय का निष्‍कष्‍र्ज्ञ त्रुटिपूर्ण है, जिसे अपास्‍थ किया जाता  है। प्रकरण की सभी  परिस्थितियों पर गंभीरता से विचार किया गया।

Monday, 9 April 2018

45 WPM Hindi dictation


462

स्‍वप्‍न सब देखते है, कल्‍पनाएं सब के मन में जन्‍म लेती है परन्‍तु ऐसे व्‍यक्ति बहुत कम होते है, जो उन्‍हें साकार करने का प्रयत्‍न करते है और उनसे भी कम संख्‍या होती है उन व्‍यक्तियों की जो अपने स्‍वप्‍नों को सचमुच साकार कर पाते है।
     स्‍वप्‍नों की बात करना क्‍या केवल स्‍वप्‍न लोक की वस्‍तु है? नहीं, यदि स्‍वप्‍न ना होते, उनको देखने वालों ने उन्‍हें यर्थाथ जीवन से सम्‍बद्ध ना माना होता तो हम आज सभ्‍यता के वर्तमान शिखर पर कदापि नहीं होते। इन स्‍वप्‍नों की बदोलत ही हम आज अंतरिक्ष की खबरे लाने में समर्थ है, चंद्रलोक की सैर करने में सक्षम है, विश्‍व ब्रह्रांड की माप करने का दम भरते है आदि। कोन नहीं जानता है कल्‍पनाशील कलाकार ही पत्‍थर के सामान टुकड़े में कलाकृति की कल्‍पना करने में समर्थ होता है। ना मालूम कितने व्‍यक्तियों ने पक्षियों को आकाश में उन्‍मुक्‍त भाव से उड़ते देखा होगा और सोचा होगा कि वे भी आकाश में पक्षियों की भांति विचरण कर सकते है, परंतु अपने इन कल्‍पनाओं को साकार करने का संकल्‍प किया राईट बंधुओं ने और वे हमाको हवाई जहाज दे गए। जेम्‍स वाट और एडीसन ने स्‍वप्‍न देखें और उनहे साकार करने के प्रयत्‍न करते हुए उनहोंने हमें विज्ञान के विभिन्‍य उपकरण प्रदान कर दिए। इस दुनिया में सभ्‍यता एवं उन्‍नति ने नाम पर हम जो कुछ भी देखते है वह सब स्‍वप्‍न दृष्‍टाओं के स्‍वप्‍नों की ही योगफल होता है विश्‍व के इतिहास में से स्‍वप्‍न दृष्‍टाओं के वृत्‍तांत निकाल दीजिए, फिर देखिए कि इतिहास में क्‍या पढ़ने योग्‍य रहा जाता है। स्‍वप्‍नदृष्‍टया वस्‍तुत: मानवता के अग्रदूत हैं। वे कठोर श्रम एवं अनवरत साधना करते हुए, अपने खून पसीने को एक करते हुए अपने स्‍वप्‍नों को साकार करने वाले साधक हैं। इन्‍होंने ही कंटकाकीर्ण वनों को साफ किया तथा पथरीली राहों को काट छांट कर मानवता के लिए साफ सपाट सड़को का निर्माण किया है मानव कल्‍याण के इन साधको की भांति क्‍या आप भी मानव को भय एवं बंधनों से मुक्‍त करने का स्‍वप्‍न देखने की कामना करते है।
     परम्‍परागत रूप से मनुष्‍य को जो कुछ प्राप्‍त होता है उसमें सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण है, कल्‍पना की वृद्धि अर्थात स्‍वप्‍न देखने की शक्ति के अनुसार जो अपने लक्ष्‍य की प्राप्ति के लिए प्रार्णपण से जुट जाते है अपने प्रयत्‍न के कृतकार्य होते है। विजय के स्‍वप्‍न को साकार करने की ललक भरे जापनी युवको ने अपनी लाशों से खाई को काट दिया था और जापानी फौजों के लिए रास्‍ता बना दिया था। सन् 1904 में रूस जैसे विशाल देश पर, छोटे से देश जापान की सनसनी विजय का यही रहस्‍य था। उन्‍हीं के स्‍वप्‍न साकार होते है जो धूल मट्टी कीचर कांटे कंकर के बीच भी काम में लगे रहने में सुख की अनुभूति करते हैं।
     आज कोई भी इस ऐतिहासिक तथ्‍य को जुठला नहीं सकता।


Saturday, 31 March 2018

40 WPM - 45 WPM Legal Hindi Dictation for Court and SSC Typing Exam


435

डाक्‍टर की राय के अनुसार मृतक की मृत्‍यु  कार्डियोरेसपिरेटरी आरेस्‍ट कारण हुई जो स्पिलिन के फटने व अधिक मात्रा में रक्‍त स्‍त्राव से हुई चोट का स्‍वरूप होमोसाइडल था। मृतक के शरीर में जो चोट थी वह  प्रकृति के सामान्‍य अनु्क्रम में उसकी मृत्‍यु कारित  करने के लिए पर्याप्‍त थी। उसकी मृत्‍यु शव परीक्षण के 18 से 20 घंटे के पूर्व हुई थी।
         मृतक को आई चोट के संबंध में जब डाक्‍टर से क्‍वरी की गई , तो उनहोंने बताया कि प्रकरण में जप्‍तशुदा लकड़ी से मृतक को उक्‍त चोट आ सकती  है  व उसकी तिल्‍ली फटने से उसकी मृतयु हो सकती  है। अभियोजन की ओर से मृतक के पिता के कथन कराए गए है जिसने अपने कथनो में यह बताया गया है कि रामटेक से इमली ढाना के भैयालाल के पास फोन आया था कि ज्‍वारीलाल को रामसिंह ने मारा, जिससे वह मर गया तब वह शांतिलाल, साहुलाल व दो-तीन अन्‍य आदमियों के साथ ज्‍वारीलाल को देखने रामटेक गया था, वहां जाकर देखा कि ज्‍वारीलाल मर चुका था व उसकी लाश आरोपी के घर में पड़ी थी। उसके पेट, माथा व शरीर के अन्‍य भागों में चोट थी, इसके उपरांत उसने पुलिस को सूचना दिया, पुलिस मौके पर आई, उसकी लाश का पंचनामा तैयार किया। लाश को शव-परीक्षण हेतु खिरकिया अस्‍पताल भेजा  गया। शवपरीक्षण पश्‍चात उसे लाश अंतिम संस्‍कार हेतु दी गई।
         इस पकार प्रकरण में प्रस्‍तुत चिकित्‍सकीय साक्ष्‍य से व मृतक  के पिता की साक्ष्‍य से यह स्‍पष्‍ट है कि घटना दिनांक को मृतक की मृत्‍यु हुई। डॉक्‍टर की राय के अनुसार मृत्‍क  के शरीर में अनेक स्‍थानों में चोट थी व उसकी  मृत्‍यु को डॉक्‍टर ने होमीसाईडल बताया है इस प्रकार  यह भी प्रमाणित है कि मृतक की मृत्‍यु मानव बध स्‍वरूप की थी।
मृतक के पिता ने अपने कथनों में यह भी बताया है कि मृतक ज्‍वारीलाल उसका लड़का है, जिसकी  शादी सुंदरबाई से हुई थी, उसका लड़का  दीपावली के 8 दिन पहले सोयाबीन की मजदूरी करने ग्राम क्षीपाबड़ आया था। उसकी पत्नि रामटेक में अपने मायके मे रह रही थी तब उसका  लड़का उसे लेने के लिए गया था। साक्षी कहता है कि वह अपने लड़के की मृत्‍यु की सूचना पाकर जब वह रामटेक गया तो उसने अपनी बहु सुदंरबाई समधी व नातिन आदि से पूछा की कैसे क्‍या हो गया, तो उनहोंने बताया कि उसे मामा ने मार दिया है। आरोपी के पिता ने भी यह बात बताई।
         साक्षी ने अपने प्रतिपरीक्षण में रामसिंह व उसके पिता नंदराम का घर अलग-अलग होना बताया है। परंतु नक्‍शा मौका प्रदर्श पी-7 के अवलोकन से यह प्रकट है कि इसमें नंदराम व रामसिंह का मकान अगल-बगल होना

Wednesday, 21 March 2018

40 - 45 WPM Hindi dictation


463
समय 11 मिनिट


आरोपी के विरूद्ध फादस की धारा 201 अंतर्गत अपराध का आरोप है कि दिनांक 04.02.2017 को समय लगभग 12 बजे रनिंग ट्रेन नम्‍बर 11015 से यात्रा करते समय फरियादी राकेश मिश्रा अपनी पत्नि पूजा का लेडिस पर्स जिसमें एक मोबाईल, एक सोने की अंगूठी, एक चेन, नगद 4280 में से फरियादी के आधिपत्‍य से चुराई गई समप्‍त्ति में से पर्स में से मो‍बाईल रूपए निकालकर पर्स को  चलती ट्रेन में फेंककर साक्ष्‍य का विलोपन किया।
        प्रकरण में स्‍वीकृत तथ्‍य यह है कि फरियादी एवं आरोपी के  मध्‍य धारा 389 फादस में राजीनामा होने के कारण आरोपीगण को दोषमुक्‍त किया गया है। अभियोजन की कहानी संक्षेप में इस प्रकार है कि दिनांक 04.02.2017 को फरियादी राकेश अपनी पत्नि के साथ ट्रेन में यात्रा कर रहा था। ट्रेन चलने के बाद उसकी पत्नि ने देखा की उसका लेडिस पर्स किसी ने चोरी कर लिया था। पुलिस के द्वारा विवेचना के दौरान साक्षीगण के कथन अंकित किए गए तथा अन्‍य आवश्‍यक विवेचना के उपरांत अभियोगपत्र इस न्‍यायालय में पेश किया गया है।
        आरोपी को कंडिका-1 के अनुसार आरोप पढ़कर सुनाए, समझाए जाने पर आरोपी ने अपराध करना अस्‍वीकार किया तथा विचारण चाहा। आरोपी का धारा-313 के अंतर्गत प‍रीक्षण किए जाने पर आरोपी ने स्‍वयं को  निर्दोष एवं झूठा फंसाया जाना बताया है तथा आरोपी की ओर से बचाव में कोई साक्ष्‍य प्रस्‍तुत नहीं की गई है।
प्रकरण से मुख्‍य विचारीण प्रश्‍न यह है कि क्‍या घटना दिनांक समय व स्‍थान पर आरोपी द्वारा फरियादी राकेश मिश्रा अपनी पत्नि पूजा का लेडिस पर्स जिसमें एक मोबाईल, एक  सोने की अंगूठी, एक चेन, नगद 4280 में से फरियादी के आधिपत्‍य से चुराई गई सम्‍पत्ति में से पर्स में से मोबाईल रूपए निकालकर पर्स को चलती ट्रेन में फेंककर साक्ष्‍य का विलोपन किया।
इस संबंध में फरियादी राकेश के द्वारा बताया गया है कि दिनांक04.02.2017 को कुशीनगर एक्‍सप्रेस से मुबंई से  वस्‍ती उत्‍तरप्रदेश अपनी पत्नि एवं बच्‍चों के साथ यात्रा कर रहा था। तब उसकी पत्नि का हेंड बैग किसी ने चोरी कर लिया था उसमें एक सोने की अंगूठी, चेन, नोकिया कंपनी का मोबाईल तथा 4280 रूपए थे। उसने प्रति 01 का आवेदन दिया था जिसके ए से ए भाग पर उसके  हस्‍ताक्षर है।
        प्रकरण के विवेचक रमेशवर्मा 02 के द्वारा बताया गया है कि उनके द्वारा  इस प्रकरण की विवेचना के दौरान आरोपी शंकर का प्रति 03 का मेमोरेण्‍डम लिया था जिसमें उसने बताया था कि ट्रेन में यात्रा कर रही एक महिला का पर्स चोरी कर लिया था जिसमें एक  सोने की चेन, सोने की अंगूठी, तथा 4020 रूपए तथा मोबाईल मिला, मोबाईल उसने ट्रेन से फेक दिया था तथा चेन एवं अंगूठी अपने पास रख ली थी। आरोपी सुनील से अंगूठी जप्‍त कर जप्‍ती पत्रक प्रति 04  बनाया था तथा आरोपी शंकर से सोने की चेन जप्‍त कर जप्‍ती पत्रक 05 तैयार किया था।

50 WPM Hindi Dictation




आरोपी के विरूद्ध यह प्रकरण अंतर्गत धारा 302 के अधीन इस प्रकार है कि उसने दिनांक 13.10.2014 को दिन के 03:00 बजे अपने स्‍वयं के मकान की टापरी स्थित ग्राम रामटेक थाना छीपाबढ़ में मृतक ज्‍वारीलाल की हत्‍या करने के आशय से उसके पेट में लकड़ी मारी, जिससे उसकी मृत्‍यु हो गयी। अभियोजन के अनुसार मामले के तथ्‍य संक्षेप में इस प्रकार है कि मृतक के पिता बुद्धु ने पुलिस थाना छीपाबढ़ में इस आशय  की सूचना दिया कि उसका लड़का ज्‍वारीलाल अपनी पत्नि सुदंरबाई को लिबाने लिए अपनी ससुराल ग्राम रामटेक गया था, साथ में उसकी नातिन रविता व कविता भी गई थी, तभी लिबाने की बात को  लेकर रामसिंह का विवाद ज्‍वारीलाल से हो गया व उसने उसके साथ लकड़ी से मारपीट किया, जिससे  उसकी मृत्‍यु हो गई, सूचना मिलने पर वह स्‍वयं रामटेक गया, वहां उसने अपने  लड़के को मरा हुआ पाया।


          घटना को रविता व कविता  ने देखा। घटना 3 बजे की बताई गई उक्‍त सूचना दिए जाने मर मर्ग क्रमांक 10/14 कायम किया गया व उसकी सूचना एसडीएम हिरकिया को दी गई। मर्ग की जांच के दौरान सूचनाकर्ता बुद्धु मृतक की पत्नि सुंदरबाई व उसकी लड़कियां रविता व कविता के कथन लिए गए। जिसमें यह बात कही गई कि मृतक को उसके सगे साले आरोपी रामसिंह ने झूमाझटकी करके जमीन में पटक दिया व जलाऊ लकड़ी से उसकी मारपीट की जिससे उसकी मृत्‍यु हो गई। मृतक व आरोपी के बीच विवाद सुंदरबाई को अपने साथ ले जाने की बात पर से हुआ। मृतक के शव का परीक्षण किया गया, जिसमें डॉक्‍टर ने मृत्‍यु का कारण मृतक की हत्‍या किया जाना बताया। इस पर आरोपी के विरूद्ध धारा 302 का प्रकरण पंजीबद्ध किया गया। मामले का अनुसंधान किया गया, जिसके अंतर्गत मौके  से  एक  लकड़ी आरोपी की निशादेही पर जब्‍त की गई जो दी फीट आठ इंच लंबी थी व उसकी मौटी 21 सेंटीमीटर थी जिसका एक शिरा कटा हुआ था व दूसरे शिरे मे गठान कटी हुई थी। पुलिस ने घटना स्‍थल का नक्‍शा मौका बनाया। आरोपी का मेमोरेण्‍डल का कथन अभिलिखित किया गया व उसको गिरफ्तार किया गया। साक्षियों कें कथन अभिलिखित किए गये तथा अनुसंधान पूरा होने पर आरोपी के विरूद्ध अभियोग पत्र अंतर्गत धारा 302 के अधीन पेश किया गया। आरोपी पर आरोप अंतर्गत धारा 302 के अधीन विरचित किए जाने पर उसने जुर्म अस्‍वीकार किया व प्रतिरक्षा चाही।
       

   क्‍या घटना दिनांक 13.10.14 को ज्‍वारीलाल की मृत्‍यु हुई जो मानववध स्‍वरूप की थी? क्‍या आरोपी ने मृतक की हत्‍या कारित करने के आशय से उसके साथ उक्‍त लकड़ी से मारपीट किया, जिससे उसकी मृत्‍यु हो गई? अभियोजन की ओर से डॉक्‍टर ऑरके विश्‍वकर्मा के कथन कराए गए है जो दिनांक 14.10.14 को सामुदायिक स्‍वास्‍थ्‍य केन्‍द्र खिरकिया में मेडिकल ऑफिसर के पद  पर पदस्‍थ थे उन्‍होंने उक्‍त दिनांक को मृतक के शव का परीक्षण किया। मृतक के इपीगेस्टिक रीजन में एक कटे हुए घाव की चोट 2 गुणा 2 सेंटीमीटर की पाई। आंख के उपर भी एक कटा हुआ घाव था जो पांच गुणा तीन सेंटीमीटर था। वाये ई‍लियफ री‍जन में एक कटे हुए घांव की चोट थी, जो पांच गुणा दो सेंटीमीटर की थी। पीठ में घिसाव के निशान थे, हाथ पैर

70 WPM

चेयरमेन साहब मैं आपसे कहना चाहता हूँ कि हम लोग देख रहे है कि गरीबी सबके लिए नहीं है कुछ लोग तो देश में इस तरह से पनप रहे है‍ कि उनकी संपत...