Saturday, 28 April 2018

48 WPM


मुझे खेद है कि मैं उपर्युक्‍त दलीलों से सहमत नहीं हो सकता। अभियोजन साक्षी 3 ने जो उसकी माता है, दृणतापूर्वक न्‍यायालय के समक्ष यह अभिसाक्ष्‍य दिया है‍ कि यद्धपि वह जीवन से उदासीन थी क्‍योंकि उसके कोई बच्‍चा उत्‍पन्‍न नहीं हो सका था। तथापि इस बात ने उसे आत्‍महत्‍या करने के लिए प्रेरित नहीं किया। इसके अतिरिक्‍त उसकी गर्भधारण की अक्षता ऐसी जल्‍दबाजी में आत्‍महत्‍या करने के लिए तुरंत प्रकोपन गठित नहीं कर सकती।
      इसके प्रति‍कूल उसकी चाची के मकान में घटित घटना से जैसा कि अभियोजन साक्षी चार और पांच ने बताया है स्‍पष्‍टत: यह उपदर्शित होता है कि अभियुक्‍त उसकी तलाश में अभियोजन साक्षी 5 के मकान तक आया था और उसने उससे वहां मिलने के पश्‍चात मकान के पिछले भाग में झगड़ा किया था। वह उस मकान में अपनी चाची की जो अभियोजन साक्षी 5 की माता थी, मृत्‍यु पर चालीसवीं के समारोह में आई थी। अभियुक्‍त अपनी पत्नि से जो उस मकान में खाना तक नहीं खा सकी। झगड़ा करने के पश्‍चात उसे उस मकान से घसीटते हुए ले गया था।  यह घटना अभियोजन साक्षी 4 और अभियोजन साक्षी 5 ने देखी थी। अभियोजन साक्षी 5 ने उसको अपने मकान में  वापस आने और तत्‍पश्‍चात खाना खाकर जाने के लिए कहा था उसने रास्‍ते में यह देखा कि अभियुक्‍त और उसके बीच झगड़ा हो रहा है और अभियुक्‍त बल पूर्वक उसकी खाली चैन छीन रहा था यह घटना एएलपी स्‍कूल के निकट हुई थी घटना उसके मकान के रास्‍ते में हुई थी और उसने स्‍कूल अहाते में स्थि‍त कुएं में कूंदकर अपनी जीवनलीला समाप्‍त कर ली थी अभियुक्‍त ने अपनी पत्नि के आत्‍म हत्‍या करने के आचरण के बारे में जानकारी होने पर साक्ष्‍य बनाने के लिए मकान की खिड़की से जिस पर किवाड़ नहीं था। मेज पर खाली चेन अर्थात मंगल सूत्र फेंक दी। अभियुक्‍त द्वारा ऐसा स्‍वयं को बचाने के लिए और निदोष साबित करने के लिए किया गया था। यदि किसी दण्‍ड न्‍यायालय के समक्ष हाजिर होने के लिए समन किए जाने पर कोई साक्षी शमन के पालन में किसी निश्चित स्‍थान और समय पर हाजिर होने के लिए वैध रूप से आबद्ध है और न्‍यायसंगत कारण के बिना उस स्‍थान पर या समय पर हाजिर होने में उपेक्षा या हाजिर होने से इंकार करता है। अथवा उस स्‍थान से, जहां उसे हाजिर होना है, उस समय से पहले चला जाता है जिस समय चला जाना उसके लिए विधिपूर्ण है और जिस न्‍यायालय के समक्ष उस   साक्षी को हाजिर होना है उसका समाधान हो जाता है कि न्‍याय के हित में यह समीचीन है कि ऐसे साक्षी का संक्षेपत: विचारण किया जाये तो वह न्‍यायालय उस अपराध का संज्ञान कर सकता है। और अपराधी को इस बात का कारण दर्शित करने का कि क्‍यों ना उसे इस धारा के अधीन दण्‍डित किया जाये। अवसर देने के पश्‍चात उसे 100 रूपए से अनधिक जुर्माने का दण्‍डादेश दे सकता है।

Friday, 27 April 2018

100 WPM HINDI


माननीय अध्‍यक्ष जी मैं इस बजट का समर्थन करता हूँ लेकिन समर्थन करते हुए एक दो बाते कहना उचित समझता हूं इस संशोधन के जरिए चाय के बागानों में   काम करने वाले मजदूरों कें हित संबंधी विषयों पर चर्चा की गई है। उनको हर प्रकार की सुविधाएं दिए जाने की बात का तो कोई भी व्‍यक्ति विरोध नहीं कर सकता है। सब लोग समर्थन ही करेंगे। यह अच्‍छा होता कि जितने बागान है यदि सरकार उन्‍हे अपने कब्‍जे में कर ले तो इससे मजदूरों का ज्‍यादा भला हो सकता था लेकिन अभी तक इतने साल बीत जाने के बाद भी ऐसा कुछ होता हुआ नहीं दिख रहा है। इस विषय पर चर्चा करते हुए मैं दो बाते और कहना चाहता हूं जो मुझे अकसर चिंतित करती है। एवं मैने उनपर एक्राग मन से विचार भ्‍ज्ञी किया है। मैंने स्‍वयं देखा है कि अभी अगस्‍त माह में रेल्‍वे कर्मचारी संगठन की बैठक हुई थी उसकी रेली में बहुत बड़ी संख्‍या में बागानों के मजदूर भी आए थे वे झंडे लेकर आए थे उनमें महिलांए नौजवान एवं बच्‍चे सभी शामिल थे उनकी शिकायत थी कि हम लोगों में से बहुत से लोग हिदीं भाषी क्षेत्रों कें है लेकिन हमारे क्षेत्र के इस फूलों में हिंदी पढ़ने की  कोई व्‍यवस्‍था नहीं है। चाय बागानों कें मालिकों ने इसकी कतई व्‍यवस्‍था नहीं की है जिसके कारण बहुत कठिनाई होती है। सरकार का नियम है कि यदि काफी संख्‍या में  ऐसे लोग हो और जिस भाषा को वे लोग जानते है उसी भाषा में उनहें शिक्षा मिलनी चाहिए। यदि यह बात सही है तो उनक बच्‍चों को अनपढ़ रखने से  क्‍या लाभ होगा जो भाषा वे नहीं जानते उसमें पढ़ना उनके लिए संभंव नहीं होगा। इसलिए आप देखें कि इस तरह का काम करने वाले मजदूरों की शिक्षा उस भाषा में  होनी चाहिए जिसे वह अच्‍छी तरह से जानते हो। चाहे वह हिंदी हो तमिल हो या कोई और भाषा मजदूरो के कल्‍याण के इस बजट का संबंध है और यदि मजूदर शिक्षित नहीं होगा तो कल्‍याण की बात भी नहीं समझेगा इसलिए उनकी इस शिकायत को दूर करे ताकि उनमें व्‍यापक संतोष दूर हो सके। अब दूसरी बात दुर्घटना के विषय ही है। दुर्घटनाए चाय के बागानों में बड़ी मात्रा में होती रहती है जिससे मजदरों कें जीवन मरण पर बात बन आती है लेकिन उनके लिए जो मुआबजा आदि उनको मिलना चाहिए वह उचित तरीके से उनको नहीं मिलता है मैं निवेदन करना चाहता हूं कि आप से शीघ्र ही इस ओर ध्‍यान दे क्‍योंकि जहां पर इस तरह की बात है जहां आप के कानून को नहीं माना जाता है वहां इस पर रोक लगाए। आप ऐसा नहीं कह सकते क हमारे देश में बढ़े बढ़े लोग नियम कानून नहीं तोड़ते है जब सरकार खुद अपने कानूनों को तोड़ती है तो मिल मालिकों कें बारे में कहना तो गलत ही है आप जो कानून बना रहे है उनका पालन हो इस बात   को देखना राज्‍य एवं केन्‍द्र सरकार दोनों का काम है। उपाध्‍यक्ष महोदय मैं आपके सामने एक बात और रखना चाहता हूं और वह यह है कि देश में बेकारी बढ़ती जा रही है और इसे रोकने का कोई उपाय सरकार अभी तक नहीं कर पाई है। सरकार अपने दूसरे कार्यो में ऐसी उलझी रहती है कि उसे इस ओर ध्‍यान देने का समय ही नहीं है। यदि वे कार्य की समस्‍या की तरफ सरकार ने ध्‍यान नहीं दिया तो देश का जो बेरोजगार वर्ग है वह क्रांति कर सकता है और अगर ऐसा हुआ तो सरकार को बड़ी परेशानी का सामना करना पढ़ेगा अत: मेरा सुझाव है कि सरकार को जल्‍दी से जल्‍दी इस समस्‍या की ओर ध्‍यान देना चाहिए यह बेकारी ऐसी नहीं है फूंक मारते ही दूर हो जायेगी इसके लिए सरकार को योजनाबद्ध तरीके से काम करना पढ़ेगा। नये नये रोजगार के अवसर ढूढ़ने होगे। पढ़ाई के ढ़ाचे में परिवर्तन करना पढ़ेगा तथा कुटीर उद्योगों के साथ साथ लघु उद्दयोंगों की ओर भी बढ़ावा देना होगा। महोदय अब में इस देश में फैली अराजकता आवश्‍यक वस्‍तुओं कें मूल्‍यों को बृद्धि के बारे में भी चाहता हूं मैं उन बातों को नहीं दोहराना चाहता हूं जो मेरे दोस्‍तों ने इस सदन कही है एक बात मैं जरूर कहूंगा इस बात हिंदुस्‍तान की चारो तरफ की परिस्थिति बढ़ी खराब है और इसमें किसी एक बात कि किसी जिम्‍मेदारी नहीं है लोगों के पास सामान खरीदने के लिए पैसा नहीं है लोग भूखें मर रहे है ऐसी हालात में आसामाजिक तथ्‍य उनके साथ मिल जाते है और दुकानों को लूटने की कोशिश करते है इसी प्रकार दंगे फसाद हमारे देश में बढ़ रहे है इन सब का कारण मूल्‍यों में बृद्धि से लगाया जा सकता है। लोगों में बेरोजगारी पहले से ही काफी है और उस पर भी अगर उनहें आवश्‍यक वस्‍तुए सस्‍ते दामों पर ना मिल सके तो उनकी हालात और भी खराब हो जाती है । एक बात बिलकुल साफ और सही है कि अगर सामान बाजार में होगा चाहे वह चीनी हो गेहूं हो चावल हो या कुछ भी हो और लोगों के पास उसे खरीदने के लिए पैसा नहीं है तो वे केवल लूटपाट ही करेगे। इसके अलावा चीजों के दाम इतने बढ़ चुके है कि गरीबों कें लिए उन्‍हें खरीदना भी मुश्किल हो गया है। इस सब की जिम्‍मेदारी किस की है। क्‍या उस गरीब की है या देश के बढ़े बढ़े राजनीतिज्ञ दलों की है। मेरे विचार में इस सब की जिम्‍मेदारी केन्‍द्र सरकार की है। और इसके लिए मैं केन्‍द्र सरकार को बता देना चाहता हूं कि जल्‍दी से जल्‍दी इसका कोई ना कोई इंतजाम किया जाये। सभापित महोदय आज हमारे देश में जमाखोरों तथा सरकारी अफसरों में एक समझौता हो चुका है। सरकार ठोक व्‍यापार को अपने हाथ में लेना चाहती है। परंतु जमाखोरों को इससे बहुत नुकसान होगा और इसलिए वे सरकारी अफसरों से मिल गए है और इसलिए वे इस नीति को विफल करना चाहते है। इन शब्‍दों के साथ मंत्री महोदय से निवेदन करना चाहता हूं कि देश में जो गरीबी तथा भुखमरी का दौर चल रहा है इसको रोकने के लिए सरकार द्वारा कुछ ना कुछ इंतजाम किया जाए।

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वन परिक्षेत्राधिकारी की ओर से अपरलोक अभियोजक द्वारा आरोपीगण को जमानत ना दिए जाने के संबंध में आपत्ति आवेदन में दस्‍तावेज पेश किया, जिसकी प्रति आवेदकगण एवं आरोपीगण के अधिवक्‍ता को दी गई, उनके द्वारा कोई जबाव ना दिया जाना व्‍यक्‍त किया गया तथा आरोपीगण की ओर से भी सूची मुताबिक दस्‍तावेज पेश किया गया। जिसकी प्रति अपरलोक अभियोजक को दी गई।
     अपीलार्थी की ओर से यह भी तर्क किया गया है कि उसका आरोपी के घर में आना जाना था और ऐसी स्थिति में गृह अतिचार नहीं माना जा सकता। अपने पक्ष समर्थन में एक न्‍याय दृष्‍टांत प्रस्‍तुत किया है जिसके अनुसार भारतीय दण्‍ड संहिता की धारा 363, 452 के अपराध में अपीलार्थी का अभियोत्री के घर आना जाना होने से व्‍यपहरण के संबंध में गृह अतिचार नहीं माना जा सकता। वर्तमान प्रकरण में घटना मध्‍य रात्रि के लगभग की है। फरियादी अपने मकान में खाना खा रहा था तब अपीलार्थी लाठी लेकर उसके घर के अंदर प्रवेश करता है। भारतीय दण्‍ड संहिता की धारा 452 के अनुसार, उपहति हमला किया या सदोष अवरोध की तैयारी के पश्‍चात गृह अतिचार के संबंध में गृह अतिचार का भारतीय दण्‍ड संहिता की धारा 442 में परिभाषित किया गया है। जिसके अनुसार जो कोई किसी निर्माण जो मानव निवास के रूप में उपयोग में आता है या किसी निर्माण में जो उपासना स्‍थल के रूप में या किसी संपत्ति की अभिरक्षा के स्‍थान के रूप में उपयोग में आता है प्रवेश करके या उसमें बना रहकर आपराधिक अतिचार करता है, वह गृह अतिचार करता है, यह कहा जाता है।
     परिसीमा अधिनियम की धारा 5 के अंतर्गत प्रस्‍तुत आवेदन में यह तथ्‍य उल्लिखित किया है कि पुनरीक्षकर्ता दिनांक तक की अवधि में किसी घातक बीमारी से ग्रहस्‍था था इस कारण आदेश दिनांक से विहत 90 दिवस के भीतर अर्थात प्रकरण दिनांक को पुनरीक्षण प्रस्‍तुत नहीं की जा सकी। आवेदन के समर्थन में स्‍वयं का श्‍पथपत्र प्रस्‍तुत किया है। साथ ही डॉक्‍टर का इस आशय का प्रमाण पत्र प्रस्‍तुत किया है कि पुनरीक्षकर्ता दिनांक की अवधि में किसी घातक बीमारी से पीडि़त था । आवेदन में उल्लिखित कारण समाधानप्रद होने से धारा 05 परिसीमा अधिनियम का आवेदन स्‍वीकार किया जाता है और विलंब को  उल्लिखित किया जाता है।
     आवेदक के विरूद्ध आरक्षी केन्‍द्र द्वारा धारा 302 भारतीय दण्‍ड संहिता की अंतर्गत अपराध पंजीबद्ध कर पूर्ण अन्‍वेषण उपरांत अभियोग पत्र प्रस्‍तुत किया गया, जो विवेचना उपरांत इस न्‍यायालय को प्राप्‍त हुआ  तथा प्रकरण के  रूप में दर्ज होकर इस न्‍यायालय में विचाराधीन है। आवेदक मृतिका का पति है। मृतिका के पति के द्वारा उसे  जान से मारने की नियत से मृतिका पर मिट्टी का तेल डालकर  माचिस से आग लगाकर गंभीर रूप से घायल किया।

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निर्वचन का यह सिद्धांत जिसमें यह अपेक्षा की गई है कि किसी संवैधानिक उपबंध के बारे में नि‍श्चित रूप से अर्थान्‍वयन संकुचित और निर्वबंधित अर्थो में नहीं किया जायेगा बलिक व्यापक और उदार पूर्वक रीति से किया जायेगा जिससे कि परिवर्तवतशील अवस्‍थाओं और प्रयोजनों की प्रत्‍याशा की जा सके। और उसे विचारगत किया जा सके। जिससे की संवैधानिक उपबंध क्षीण ना हो जाये और ना ही आस्‍वभूत हो जाये। बल्कि वह पर्याप्‍त रूप से लचीला बना रहे ताकि वह उद्भूत होने वाली समस्‍याओं और चुनौतियों पर खरा उतर सके। संविधान द्वारा अधिनियमित आधारभूत अधिकार के संबंध में अधिक बल पूवर्क लागू होता है इसलिए जीवन संबंधी आधारभूत अधिकार जो कि सर्वोच्‍य मूल्‍यवान मानवीय अधिकार है और जो सभी अन्‍य अधिकारों का शिखर स्‍वरूप है उसके बारे में यह आवश्‍यक है कि उसका निर्वचन व्‍यापक और विस्‍तीर्ण भावना से किया जाये जिससे कि इसे महत्‍वपूर्ण और मार्मिक बनाया जा सके। जिससे की वह आने वाले अनेक वर्षो के लिए  अनश्‍वर बना रहे। और व्‍यक्ति की गरिमा और मानवमात्र के महत्‍व को वर्धित कर सके। सर्वोच्‍य न्‍यायालय द्वारा उपर्युक्‍त उद्दत विनिर्णयों के माध्‍यम से प्रतिपादित संविधान के निर्वचन का सिद्धांत और संविधानिक दर्शन का किसी विवाद में खण्‍डन नहीं किया गया है। किंतु मामले का बिंदु वर्तमान मामले के तथ्‍यों और परिस्थितियों से संबंधित यह है कि प्रश्‍नगत प्रथम इत्तिला रिपोर्ट संगेय अपराधो का करना प्रकट करती है और इस प्रक्रम पर उक्‍त प्रथम इत्तिला रिपोर्ट दर्ज करने में असद्भावना की अंतग्रस्‍तता अब निर्धारित नहीं की जा सकती है। हमें पूर्ववर्ती पैराग्राफों में की गई विस्‍तृत चर्चा में इस रिट याचिका में कोई गुणागुण नहीं दिखाई देता है पैरा राजनीति से नैतिक मूल्‍यों का एवं सिंद्धांतो का निरंतर ह्रास होता जा रहा है सत्‍ता पाने के लिए राजनेता झूठ और फरेब का सहारा लेने लगे है तथा प्रलोभनों से जनता को  गुमराह करने जा रहे है। चूकि हमारा शासन राजनीतिक दलों में खातों में है इसलिए हमारी सुरक्षा और विकास इन पर ही निर्भर है। वर्ष 1951 से भारत में उदारीकरण और आर्थिक सुधार नीति लागू की गई जिसके कारण देश आर्थिक तरक्‍की करने लगा परंतु सत्‍ता की भूंख ने देश को विभाजित करने वाले मुद्दों को हवा दी। धर्म व राजनीति दोनो अपनी अपनी जगह स्‍वतंत्र है आज भी इन स्‍वार्थ प्रेरित भावनाओं से हमें एकता अखण्‍डता धर्मनिरपेक्षता आर्थिक व सामाजिक असमानता रोजगार शिक्षा व उन्‍नति और विकास की समस्‍याओं कें हल के रास्‍ते से भटकाने के प्रयास किए जा रहे है। शास्‍वत सत्‍य यह है कि यह विभिन्‍य धर्म भाषा और वेषभूषा ही हमारी संस्‍कृति की अंतर्राष्‍ट्रीय पहचान है।

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विचारण न्‍यायालय में पुनरीक्षणकर्ता आरोपी की ओर से आवेदन पत्र अंतर्गत धारा 243 दण्‍ड प्रक्रिया संहिता प्रस्‍तुत कर लोक सूचना अधिकारी सहायक पुलिस महानिरीक्षक को प्रदर्श डी-10 व 11 से संबंधित असल रिकॉर्ड के साथ तलब किए जाने की प्रार्थना की गई है। विचारण न्‍यायालय द्वारा दोनों पक्षों को उक्‍त आवेदन पर सुनने के पश्‍चात आलोच्‍य आदेश पारित किया, जिसमें यह उल्‍लिखत किया गया कि साक्षी एसके दास ने प्रतिपरीक्षण में पद्रर्श डी-10 व 11 के पत्र विभाग द्वारा जारी किया जाना स्‍वीकार किया है। और यह दस्‍तावेज पूर्व में प्रदर्शित हो चुका है। और आरोपी साक्ष्‍य प्रस्‍तुत कर लेख तथ्‍यों को प्रमाणित कर सकता है। साक्षी को आहुत किया जाना न्‍यायोचित नहीं पाते हुए आवेदन निरस्‍त कर  दिया गया।
     जहां तक आवेदन पत्र में चाहे गये मूल रिकॉर्ड का संबंध है इस संबंध में यद्धपि आदेश में स्‍पष्‍ट रूप से उल्‍लेख नहीं है,
परंतु विधि का यह सर्वमान्‍य नियम है कि किसी अनुतोष को यदि आदेश या निर्णय के द्वार स्‍पष्‍ट रूप से नहीं दिया गया तो चाहा गया अनुतोष अमान्‍य कर दिया गया है। ऐसा मान लिया जायेगा। प्रदर्श डी-10 व 11 के दस्‍तावेजों के अवलोकन से यह पाया जाता है कि दोनों दसतावेज अभियोजन की साक्ष्‍य को प्रतिपरीक्षण के दौरान बचाव पक्ष की ओर से प्रदर्शित कर दिए गए है और उसके संदर्भ में प्रतिपरीक्षण में प्रश्‍न भी किए गए है।
     भारतीय साक्ष्‍य अधिनियम की धारा 64 के अनुसार दसतावेजो के संबंध में प्राथमिक साक्ष्‍य के द्वारा साबित किया जाना चाहिए, परंतु द्वितीय साक्ष्‍य के रूप में कब दस्‍तावेज के अस्तित्‍व की दशा और अंतवस्‍तु की साक्ष्‍य दी जा सकती है। इसके बारे में भारतीय साक्ष्‍य अधिनियम की धारा 65 में प्रावधान किया गया है, जिसमें यदि दस्‍तावेज लोक दस्‍तावेज है या किसी ऐसे दस्‍तावेज जिसकी प्रमाणित प्रति साक्ष्‍य अधिनियम या भारत की किसी अन्‍य विधि के अनुसार अनुज्ञात किया गया है वहां मूल दस्‍तावेज को पेश करना आवश्‍यक नहीं है।
     इसके अतिरिक्‍त दस्‍तावेज पेश करने या साक्षी को आहुत करने के संबंध में किया गया आदेश अंतवर्ती आदेश होता है, जिसके विरूद्ध पुनरीक्षण धारा 397 दण्‍ड प्रक्रिया के अंतर्गत ग्राह्रय नहीं है इस प्रकार पुनरीक्ष्‍ण अंतवर्ती आदेश के विरूद्ध किया गया है जो विधि अनुसार पोषणीय नहीं है इस सबंध में माननीय उच्‍च न्‍यायालय द्वारा मार्गदर्शी सिद्धांत प्रतिपादित किया गया है, जिसके आलोक में इस आधार पर निरस्‍त किया गया है कि उन अभियुक्‍त द्वारा इस अवसर पर जिन साक्षीगण को आहुत किए जाने का निवेदन किया है, उन साक्षीगण का प्रतिपरीक्षण पूर्व अधिवक्‍ता द्वारा पूर्व में ही किया जा चुका है और बचाव पक्ष ने अपने आवेदन में ऐसा कोई विधिक बिंदु स्‍पष्‍ट नहीं किया है, जिससे उक्‍त साक्षीगण को आहुत किया जाना आवश्‍यक प्रतीत होता हो।

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 धारा 437 दण्‍ड प्रकिया संहिता में प्रावधान है कि यदि मजिस्‍ट्रेट द्वारा विचारण न्‍यायालय अजमानतीय अपराध के मामले साक्ष्‍य देने के लिए नियत प्रथम तारीख से सात दिन की अवधि के अंदर विचारण पूरा नहीं हो पाता है तथा यदि ऐसा व्‍यक्तिउक्‍त संपूर्ण अवधि के दौरान अभिरक्षा में रहा है, जब तक ऐसे कारणों से जो लेखबद्ध किए जायेगे, मजिस्‍ट्रेट अन्‍यथा निर्देश ना दे, मजिसट्रेट के समाधानप्रद जमानत पर छोड़ दिया जायेगा। उक्‍त धारा के अंतर्गत प्रसतुत आवेदप प्रत्र के विरूद्ध पुनरीक्षण याचिका प्रचलन योग्‍य है। अभिलेख के परिशीलन से स्‍पष्‍ट है कि हस्‍तगत प्रकरण में अभियुक्‍त पर दिनांक 05.08.2017 को धारा 34 मध्‍यप्रदेश आबकारी अधिनियम 1915 के अंतर्गत आरोप लगाया जाकर अभियोजन साक्ष्‍य हेतु नियत किया, लेकिन उक्‍त्‍ दिनांक 05.08.2017 से 2 माह अर्थात 60 दिन दिनांक 05.10.2017 तक अभियोजन साक्ष्‍य पूरी नहीं हो पाई। अभिलेख के परिशीलन से यह भी स्‍पष्‍ट है‍ कि अभ्यिुक्‍त अन्‍नू उर्फ अन्‍ना ने दिनांक 25.05.2017 को 8 पेटियों में भरी हुई अवैध रूप से रखी देशी मशाला मदिरा कुल 72 वल्‍क लीटर जप्‍त हुई थी। ऐसे मामले में अभियुक्‍त को तब तक जमानत पर नहीं छोड़ा जा सकता। जब तक कि न्‍यायालय को यह समाधान ना हो जाये कि अभियुक्‍त ने अपराध नहीं किया है अथवा आगे भी वह ऐसा नहीं करेगा। यह भी अविवादित है कि माननीय उच्‍च न्‍यायालय द्वारा दिए गए उक्‍त आदेश के प्राप्‍त होने पर अपर सत्र न्‍यायालय ने तदनुसार कार्यवाही करते हुए पुनरीक्षकर्ता अभियुक्‍त राहुल तथा अन्‍य अभियुक्‍त धारासिंग पर धारा 147, 452, 325 विकल्‍प में धारा 325 तथा 506 भाग-2 भारतीय दण्‍ड संहिता के अंतर्गत आरोप विरचित कर यह प्रकरण अन्‍यन्‍यत: सत्र न्‍यायालय द्वारा विचारण योग्‍य ना पाते हुए इसे संबंधित की ओर प्रतिप्रेषित कर विधि अनुसार कार्यवाही करने का आदेश दिया था। जिस पर से न्‍यायिक मजिस्‍ट्रेट प्रथम श्रेणी ने उक्‍त अभ्यिुक्‍तगण के विरूद्ध अपर सत्र न्‍यायाधीश के आदेश अनुसार आरोप लगाते हुए विचारण शुरू किया था।
      उभय पक्ष के तर्को पर विचार किया गया। पुनरीक्षण का वैधानिक अधिकार नहीं है जिसमें विधि या तथ्‍यो कें प्रश्‍न पर निराकरण की मांग  की जा सके। आपराधिक स्थिति में आदेश में हस्‍तक्षेप किया जा सकता है। इस संबंध में माननीय मध्‍यप्रदेश उच्‍च न्‍यायालय द्वारा गोपाल बनाम कन्‍हैया लाल 1984 एंव श्री अंशदास हिंदी विद्यापीठ बनाम नारायण दास 1986 में मार्गदर्शी सिद्धांत प्रतिपादित किए गए है जब जिस आलोचय आदेश के संबंध में तर्क किया गया है वह आदेश पुनरीक्षण योग्‍य है या नहीं। इस पर सर्वप्रथम विचार किया जाना आवश्‍यक होगा।
      अंतवर्ती आदेश के विरूद्ध पुनरीक्षण प्रचलन योग्‍य नहीं होता। जमानत के संदर्भ में जमानत देना है या नहीं देना या जमानत आदेश में कोई शर्त लगाना आदि के संबंध में आदेश अंतवर्ती होता है । इस संबंध में न्‍यायदृष्‍टांत पवन विरूद्ध हरभजन सिंह 2012 में मार्गदर्शी सिद्धांत प्रतिपादित किए गए है।

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अभियोजन की कहानी संक्षेप में इस प्रकार है कि घटना दिनांक को शाम के करीब छह बजे अभियोगी बकरी का दूध निकालने जा रही थी तो अभियुक्‍तगण ने अभियोगी को रोका और बोला कि तुम बकरी का दूध नहीं निकालना। तब अभियोगी ने कहा कि वह उसकी बकरी है और अभियोगी दूध निकालने जायेगी। इस बात पर तीनों आरोपीगण ने अभियोगी को नंगी-नंगी गालिया दी और जब अभियोगी ने गालिया देने से मना किया तो अभियुक्‍तगण ने अभियोगी को डंडे व पत्‍थर से मारा जिससे अभियोगी को दाहने हाथ के उपर पीठ में व दाहने पैर में चोट लगी। तीनों आरोपीगण जाते जाते बोले कि अब दोबारा उनके बीच में आई तो जान से खत्‍म कर देंगे। घटना अभियोगी के पति व आसपास के लोगों ने देखी व सुनी है। रात्रि अधिक होने से अगले दिन अभियोगी ने उसके पति के साथ जाकर घटना की रिपोर्ट थाना गौतमपुरा पर की जिस पर अपराध क्रमांक 162/12 अंतर्गत धारा 294 एवं 506 भारतीय दण्‍ड संहिता का मामला पंजीबद्ध किया गया।
       उक्‍त प्रकरण में विवेचना के दौरान घटना स्‍थल का मौका नक्‍शा बनाया गया अभियुक्‍तगण को पकड़कर पंचनामा बनाया गया, आहत का चिकित्‍सकीय परीक्षख कराकर चिकित्‍सकीय दस्‍तावेज अभिसाक्ष्‍य किए गए। जप्‍ती अनुसार जप्‍ती पत्रक बनाया गया। साक्षीगण के कथन लेखबद्ध किए गए। तद्परान्‍त अभियोग पत्र न्‍यायालय में पेश  किया गया। अभियुक्‍तगण ने उस पर आरोपित अपराध कारित करना अस्‍वीकार किया है। अभियुक्‍तगण ने घटना दिनांक को छह बजे अभियोगी के घर के सामने गौतमपुरा में लोकस्‍थल पर अभियोगी को मां-बहन की अश्‍लील गांलिया उच्‍चारित कर उसे एवं सुनने वालों को क्षोभ कारित किया। अभियोगी और अभियोजन साक्षी 01 का अभिकथन है कि वह आरोपीगण को पहचानती है क्‍योंकि आरोपीगण उस की रिश्‍तेदार है।
       मामले का परिक्षण दिनांक से लगभग 2-3 वर्ष की पूर्व की होकर शाम के छह बजे की रामपुर की घटना है। इस साक्षी ने अपने मुख्‍य परीक्षण में उसे मां’बहन की अश्‍लील गालिया दिए जाने और जान से मारने की धमकी दी जानी तथा रास्‍ता रोके जाने के संबंध में कोई कथन नहीं किया है। परंतु अभियोजन द्वारा पक्ष विरोधी घोषित कर किए गए प्रतिपरीक्षण के दौरान अभियुक्‍तगण ने उसे मां-बहन की अश्‍लील गालियां दी थी बचाव पक्ष के प्रतिपरीक्षण के दौरान यह भी स्‍वीकार किया है कि अभियोगी के मकान से अलग है पर दीवार एक ही है। जबकि अभियुक्‍त उसके साथ ही रहती है। चरण क्रमांक 06 में यह भी स्‍वीकार किया है कि यहां विगत् 2-3 वर्षो से उसका आना जाना नहीं है। बचाव पक्ष को अभियुक्‍तण द्वारा गाली-गलौच विगत् दो वर्षो से अलग करना एक एक नहीं है इसलिए आवश्‍यकता केवल इस बात की है कि इस संबंध में क्‍या उचित कार्यवाही होना चाहिए।

70 WPM

चेयरमेन साहब मैं आपसे कहना चाहता हूँ कि हम लोग देख रहे है कि गरीबी सबके लिए नहीं है कुछ लोग तो देश में इस तरह से पनप रहे है‍ कि उनकी संपत...